खरलांजी नरसंहार : मौत की सजा आजीवन कारावास में बदली (लीड-1)
न्यायमूर्ति ए.पी.लावन्डे और न्यायमूर्ति आर.सी.चौहान की खंडपीठ ने बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका खारिज कर दी।
एक निचली अदालत ने वर्ष 2008 में आठ आरोपियों में से दो को आजीवन करावास और छह को मौत की सजा सुनाई थी। सभी दोषियों को 25 वर्ष के आजीवन कारावास की सजा देते हुए खंडपीठ ने कहा कि यह मामला 'जघन्य से जघन्य' (रेयरेस्ट ऑफ द रेयर) अपराध की श्रेणी में नहीं है।
अपनी पत्नी, बेटी और दो बेटों को पीट-पीटकर हुई हत्या का सदमा झेलने वाले भैयालाल भोतमांगे ने फैसले के तुरंत बाद संवाददाताओं से कहा, "इस त्रासद मामले में मुझे न्याय नहीं मिला।"
सीबीआई ने सभी दोषियों को मौत की सजा देने की मांग की थी। उसने उच्च न्यायालय से इन लोगों को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारक कानून, 1987 के तहत भी आरोपी बनाने का आग्रह किया था।
भडाना की जिला अदालत ने शत्रुघ्न धांडे, विश्वनाथ धांडे, रामू धांडे, सर्कु बिंजेवार, जगदीश मांडेलकर और प्रभाकर मांडेलकर को वर्ष 2008 में मौत की सजा सुनाई थी जबकि शिशुपाल धांडे और गोपाल बिंजेवार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। तीन अरोपियों को बरी कर दिया गया था।
बचाव पक्ष के वकील नीरज खांडेवाले ने उच्च न्यायालय में कहा कि अभियोजन के मामले में कई कमियां हैं, यह झूठ, फर्जी गवाहियों और मनगढं़त तथ्यों पर आधारित है।
खरलांजी गांव में ग्रामीणों के एक समूह ने कथित रूप से 29 सितंबर 2006 को भैयालाल भोतमांगे के परिवार पर हमला बोल कर उसकी पत्नी, दो बेटों और एक बेटी को मार डाला।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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