'सुलह की संस्कृति के अभाव के कारण लंबित हैं मुकदमे'
कपाड़िया ने कहा कि अन्य देशों में लोग मुकदमा लड़ने के बदले समझौता करने को महत्व देते हैं। इसके साथ ही कपाड़िया ने इस संस्कृति के लिए ताईवान का जिक्र किया।
कपाड़िया, सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और प्रमुख न्यायविदों के दो दिवसीय राष्ट्रीय मध्यस्थता सम्मेलन में उद्घाटन भाषण दे रहे थे।
कपाड़िया ने कहा कि किसी मामले में समझौता करने के बदले उसे जीतने की मानसिकता, अति पूर्वाग्रही लोगों की मुख्य समस्या है। उन्होंने कहा कि पूर्वाग्रह के कारण लोगों के दिमाग में समय की कीमत न के बराबर रह गई है। इस कारण पांच रुपये की वसूली के लिए लोग अदालतों में 15 साल बर्बाद करेंगे।
कपाड़िया ने कहा कि वास्तविक चुनौती सुलह की संस्कृति विकसित करने की है और इस प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका अदालतों से बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
कपाड़िया ने कहा कि अदालत, वादियों के सामने जीत-हार का दृश्य प्रस्तुत करती है, जबकि मध्यस्थता दोनों पक्षों की जीत का दृश्य प्रस्तुत करती है।
कपाड़िया ने मध्यस्थता की सफलता के लिए न्यायिक, बार संबंधी और संवैधानिक सुधारों का आह्वान किया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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