आईक्यू के बारे में अमेरिकी शोध की आलोचना

फरीदाबाद स्थित एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट कमल वर्मा ने कहा, "यह रिपोर्ट निश्चित रूप से नस्लवादी है। बीमारी और बुद्धिमानी में कोई संबंध नहीं है।"

वर्मा ने आईएएनएस से कहा, "इससे पहले के एक शोध में बुद्धि को देश की संपत्ति और अमीरी से जोड़ने की कोशिश की गई थी लेकिन अमेरिका के लोगों का आई क्यू अभी भी ब्राजील जैसे देशों से काफी कम है। सब जानते हैं कि ज्यादातर विकसित देश विकासशील देशों की बुद्धि का ही उपयोग कर रहे हैं।"

न्यू मेक्सिको विश्वविद्यालय में किए गए इस शोध में दुनियाभर में बुद्धिमानी की विविधता के कारण साबित करने का दावा किया गया है और गर्म देशों में मलेरिया, टेटनस और तपेदिक जैसी बीमारियों को इसका कारण बताया गया है।

दिल्ली में अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट पी. एन. रंजन ने कहा कि आई क्यू मापने की विधि के गलत होने से ही यह भ्रम पैदा होता है।

उन्होंने कहा, "सामान्यत: आई क्यू मापने की विधि में मौखिक प्रदर्शन ही शामिल किया जाता है उत्पादकता प्रदर्शन की उपेक्षा की जाती है।" यानि वाचाल व्यक्ति बुद्धिमान घोषित कर दिए जाते हैं और कुशल कार्य करने वाले लोग मूर्ख। इसी कारण विकासशील देशों के लोगों को इन अध्ययनों में कम आई क्यू वाला माना जाता है।

रंजन ने कहा, "तपेदिक और मलेरिया जैसी बीमारियां बच्चों को स्कूल जाने से तो रोक सकती हैं लेकिन उनका बुद्धिमानी पर कोई असर पड़ता हो ऐसा नहीं है।"

रंजन ने कहा, "बीमारी के दौरान सामान्य रूप से व्यक्ति का दिमाग थक जाता है। रोगी की स्वथ्य व्यक्ति से तुलना करना ही गलत है।"

अध्ययन में कहा गया है कि गर्म इलाकों वाले देशों में लोग संक्रमण से पीड़ित होते हैं, जिंदा रहना उनकी पहली प्राथमिकता होती है इसलिए लोगों में बुद्धि के बजाय मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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