रोहतांग सुरंग महत्वपूर्ण क्यों है
सोलन (हिमाचल प्रदेश), 28 जून (आईएएनएस)। रोहतांग सुरंग, लेह-मनाली राजमार्ग को हर मौसम में रणनीतिक लद्दाख क्षेत्र तक सुगम बनाने की दिशा में एक प्रमुख कदम है। यह क्षेत्र चीन और पाकिस्तान की सीमा से लगा हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सोमवार को इस सुरंग की आधारशिला रखी।
यद्यपि इस सुरंग का विचार 1984 में ही सामने आया था, लेकिन 1999 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए कारगिल युद्ध ने श्रीनगर-कारगिल-लेह राजमार्ग के विकल्प के रूप में लद्दाख के लिए एक सड़क संपर्क के महत्व को रेखांकित कर दिया।
कहा जाता है कि 1999 में पाकिस्तानी सेना की मदद से बड़ी संख्या में आतंकियों की घुसपैठ का मकसद महत्वपूर्ण श्रीनगर-कारगिल-लेह राजमार्ग को काटना और लद्दाख व सियाचिन ग्लेशियर के अग्रिम इलाकों में आपूर्ति को ठप्प करना था। इसके बाद पाकिस्तानी सेना द्वारा हमले की योजना थी।
श्रीनगर-कारगिल-लेह राजमार्ग, नियंत्रण रेखा (एलओसी) से लगा हुआ है और यहां पाकिस्तान द्वारा सीमा पार से गोलीबारी का खतरा बना रहता है। हालांकि दोनों देशों के बीच 2003 में हुए एक संघर्ष विराम समझौते के बाद से गोलीबारी बंद है।
13,300 फुट की ऊंचाई पर बनने वाली रोहतांग सुरंग, श्रीनगर-कारगिल-लेह राजमार्ग के लिए वैकल्पिक संपर्क की दिशा में एक कदम है।
इस सुरंग पर 1,500 करोड़ रुपये की लागत आने वाली है। इससे मनाली-लेह राजमार्ग पर सड़क की दूरी लगभग 48 किलोमीटर कम हो जाएगी और यात्रा समय में चार घंटे की कमी आएगी। प्रतिदिन कोई 1,500 भारी वाहन और 3,000 हल्के वाहन 80 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से सुरंग पार कर सकते हैं।
लेकिन रोहतांग सुरंग, मनाली-लेह राजमार्ग को बारहमासी बनाने के लिए अकेले पर्याप्त नहीं है, क्योंकि रास्ते में बारालाचा ला और थांगलांग ला जैसे दो बर्फीले दर्रे और हैं।
रक्षा विभाग के एक प्रवक्ता ने बताया कि इन बर्फीले दर्रो से पार पाने के लिए रोहतांग परियोजना में 292 किलोमीटर लंबे बारहमासी मार्ग के निर्माण की योजना बनाई गई है। यह मार्ग पदम-दारचा से शिंकुनला दर्रे से होते हुए लद्दाख के दूरवर्ती इलाके जानस्कर तक जाएगा। इस मार्ग के निर्माण पर 286 करोड़ रुपये की अतिरिक्त लागत आएगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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