कबीर की 613वीं जयंती मनाई गई
आगरा, 26 जून (आईएएनएस)। पंद्रहवीं सदी के भक्ति कवि कबीर दास की 613 वीं जयंती या प्रकटयोत्सव के अवसर पर शनिवार को यहां उनके 2,000 से ज्यादा कबीरपंथी अनुयायी इकट्ठे हुए।
इस अवसर पर यहां सुर सदन सभागार में सतसंग और कबीरी संगीत वाद्य यंत्रों खंजरी, ढोलक, चिमटा, मंजीरा, झांझा, हारमोनियम और तम्बूरा के साथ कबीर के दोहों की प्रस्तुति की गई।
आयोजन समिति के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद के मुताबिक हिंदू और मुसलमान दोनों ही कबीर के अनुयायी हैं और वे अलग-अलग जीवनशैलियों और परंपराओं का निर्वहन करते हैं।
प्रसाद ने कहा, "कबीर ने धर्मो से जुड़ी कट्टरता और अज्ञानता का विरोध किया था। उन्होंने अपने समय के राजाओं और जातीय नेताओं का विरोध किया था।"
ताजमहल का शहर आगरा कबीरपंथियों का पसंदीदा शहर है। यहां कबीरपंथियों के आठ मंदिर हैं और यहां पर सभी साधारण वेश-भूषा में रहते हैं व जातीयता को कोई महत्व नहीं देते हैं।
हिंदी साहित्य को कबीर के योगदान पर सेंट जॉन्स कॉलेज की हिंदी विभाग की प्रमुख मधुरिमा शर्मा कहती हैं, "कबीर ने जन उन्मुखीकरण के साथ भाषा और साहित्य को प्रभावित किया है। उन्होंने हजारों साल के सामूहिक विवेक को दोहों में सरलता से प्रस्तुत किया है। ये दोहे बोलने और सुनने में सरल हैं और इन्हें आसानी से याद रखा जा सकता है।"
उन्होंने कहा, "कबीर एक ज्ञानमार्गी भक्ति कवि थे। उनकी धर्मनिरपेक्षता और मूर्तिभंजन संबंधी विचारों ने आगे की पीढ़ियों के अनेक कवियों को प्रभावित किया। वह आज भी प्रासंगिक हैं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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