चमत्कारी फसल से होगी अगली हरित क्रांति

वाशिंगटन, 25 जून (आईएएनएस)। हाल ही में हुए एक शोध के मुताबिक अगले कुछ दशकों में ऐसी बारहमासी अनाज की फसल तैयार कर ली जाएगी जो पर्यावरण के अनुकूल होगी, इसे उगाने में खाद और ईंधन की बहुत कम आवश्यकता पड़ेगी और इस फसल से भूमि का कटाव भी नहीं होगा।

वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी (डब्ल्यूएसयू) के मृदा विज्ञान के प्रोफेसर जान रीगनॉल्ड ने कहा, "बारहमासी अनाज की फसल का आविष्कार पिछले 10,000 साल का सबसे क्रांतिकारी आविष्कार होगा और ब्रीडिंग प्रोगाम के जरिए जल्द ही ऐसा किया जा सकता है।"

यह बारहमासी पौधा दो साल से ज्यादा समय तक जिंदा रहता है।

रीगनॉल्ड ने अपने सहयोगी और कान्सॉस के सेलिना में लैंड इंस्टीट्यूट के मृदा वैज्ञानिक जेरी ग्रोवर के साथ यह शोध किया है।

शोध रिपोर्ट में सीमित भूमि संसाधनों पर रह रही दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी के लिए खाद्यानों की घटती उपलब्धता से निपटने के उपयों पर विचार किया है।

शोधकर्ता ने कहा कि बारहमासी फसलों के उपयोग से किसान अपनी फसलों को पर्यावरण के दबाव से बचाने में कामयाब हो सकेंगे।

रीगनाल्ड ने कहा, "लोग खाद्य सुरक्षा के बारे में बात करते हैं लेकिन यह सिर्फ समस्या का आधा हिस्सा है, हमें खाद्य के साथ-साथ जैवतंत्र की सुरक्षा की भी बात करनी चाहिए।"

बारहमासी फसलों की समय अवधि सामान्य फसलों की तुलना में ज्यादा होती है और इनकी जड़ें गहरी होने से यह जमीन से ज्यादा पोषण लेकर तेजी से वृद्धि करती हैं।

इन पौधों 10 से 12 फुट लंबी जड़ें मृदा का कटाव रोकती हैं और मृदा निर्माण में भी मदद करती हैं। इन फसलों के रखरखाव के लिए मशीनों और खाद आदि की बहुत कम जरूरत होती है।

साधारण फसलों को बारहमासी फसलों की तुलना में पांच गुना ज्यादा पानी और 35 गुना ज्यादा नाइट्रेट की जरूरत होती है।

रीगनॉल्ड ने कहा, "हमारी प्रमुख अनाज फसलों की बारहमासी फसलें विकसित होने पर खाद्यान्य समस्या का निवारण हो सकेगा।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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