हिमाचल प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध
विशाल गुलाटी
रेकांग पेव (हिमाचल प्रदेश), 16 जून (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के जनजातीय लोग जिले में प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध में उठ खड़े हुए हैं। उनका कहना है कि इनसे न सिर्फ जलापूर्ति बल्कि उनकी जीविका भी प्रभावित हो रही है।
सतलुज नदी का ज्यादातर हिस्सा कंपनियों को दिए जाने से पानी पर अधिकार के लिए परियोजना प्रबंधकों और ग्रामीणों के बीच झगड़े आम हो गए हैं।
जनांदोलन चला रहे हिम लोक जागृति मंच के अध्यक्ष आर. एस. नेगी ने कहा, "आप देखिए यहां परियोजना के नाम पर हजारों पेड़ काट दिए गए हैं और नदी (सतलुज) और पानी के अन्य स्रोतों में मलबा भर दिया गया है। भारी निर्माण के कारण कई इलाकों में पानी की कमी हो गई है।"
यहां नेसांग गांव में रहने वाले सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी नेगी ने कहा, "यह पर्वत के साथ दुष्कृय हो रहा है।"
किन्नौर जिले में सतलुज नदी पर 1,000 मेगावॉट के किरचम-वांग्टू, 100 मेगावॉट की टिडोंग, 195 मेगावॉट की कसांग, 402 मेगावॉट की शोंगटोंग-करचम और 100 मेगावॉट की शोरांग जल विद्युत परियोजनाओं पर काम चल रहा है।
कराचम-वांगटू जल विद्युत परियोजना के निकट स्थित गांव उरनी गांव की निवासी ब्रिगू देवी ने कहा, "अब हमने तय कर लिया है कि हमारे जल स्रोतों को बर्बाद कर रही इन कंपनियों के खिलाफ हम संघर्ष शुरू करेंगे।"
हिमालय नीति अभियान के प्रमुख कुलभूषण उपमन्यू ने कहा, "अब तक जो कुछ हुआ वह हो गया लेकिन अब हम किसी को अपने संसाधनों को बर्बाद नहीं करने देंगे। हम चाहते हैं कि सरकार ऐसी परियोजनाएं शुरू करना बंद करे और खासकर सतलुज नदी बेसिन जहां जमीन बहुत भंगुर है वहां अब कोई परियोजना शुरू न करे।"
मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने आईएएनएस से कहा, "सरकार इस समस्या के प्रति सचेत है और हमने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मलबे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए निर्देश दिए हैं।"
हिमाचल प्रदेश में प्रचुर मात्रा में जल संसाधन उपलब्ध हैं जिनसे करीब 23,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन की संभावनाएं हैं। अब तक यहां से 6,480 मेगावॉट बिजली का उत्पादन शुरू किया जा चुका है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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