कार्यसमिति बनी मोदी का 'लांचिग पैड'
होर्डिंगों, बैनरों व पोस्टरों में छाए रहने के बाद मोदी विज्ञापनों के जरिए आज अखबारों में छाए हुए हैं। गुजरात में रह रहे बिहार के लोगों की ओर से जारी इस विज्ञापन के जरिए वह खुद को बिहार की जनता के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश करते देखे जा सकते हैं। कार्यसमिति की बैठक के पहले दिन यानी शनिवार को पटना से प्रकाशित होने वाले लगभग सभी अखबारों में एक पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छपा है, जिसमें लिखा है कि गुजरात और बिहार का बहुत पुराना संबंध रहा है।
यही नहीं, इस विज्ञापन के जरिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विकास मॉडल पर मोदी के मॉडल को भारी पड़ते दिखाया गया है। विज्ञापन में कहा गया है, "संकट की घड़ी में गुजरात हमेशा बिहार के साथ खड़ा रहा है। कोसी नदी में 2008 में आई बाढ़ के दौरान भी गुजरात ने बिहार को सर्वाधिक मदद दी।"
विज्ञापन में यह भी कहा गया है, "विभिन्न धर्म, जाति व सामाजिक तबके का होने के बावजूद गुजरात में लोग शांति व समृद्घि के साथ रह रहे हैं।" दरअसल, ऐसा करके मोदी के कथित साम्प्रदायिक चेहरे को धर्मनिरपेक्षता के लबादे से ढकने की कोशिश की गई है। पिछले गुरुवार को भी प्रदेश के अखबारों में एक विज्ञापन छपा था जिसमें गुजरात के मुसलमानों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति दर्शाई गई थी और बताने की कोशिश की गई थी कि गुजरात के मुसलमान देश में सर्वाधिक समृद्घ हैं।
सनद रहे कि मोदी इन दिनों अपने आप को औपचारिक तौर पर अटल-आडवाणी के बाद भाजपा का भारी चेहरा घोषित कराने की कवायदों में जुटे हैं। हाल ही में संपन्न राज्यसभा चुनावों में भी इसकी बानगी देखने को मिली। पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिए घोषित उम्मीदवारों में बाजी उनके हाथ लगी जिन पर मोदी का हाथ रहा। मसलन राम जेठमलानी, तरुण विजय, अनिल दवे। संगठन से जुडे अहम फैसलों पर भी मोदी की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। मोदी के कहने पर ही पार्टी ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के राजनीतिक इस्तेमाल के मुद्दे पर आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की।
बहरहाल, मोदी की इस राह में संघ की सहमति एक बडा रोड़ा है लेकिन मोदी समर्थक संघ को यह समझाने में जुटे हैं कि उसे मोदी के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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