सुलह की गुंजाइश न होना बनेगा तलाक का आधार (लीड-1)

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के बाद केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने संवाददाताओं को बताया, "इस संशोधन की बदौलत आपसी सहमति से तलाक मांगने वाले ऐसे पक्षों को संरक्षण मिलेगा, जो आपसी सहमति के आधार पर तलाक के लिए याचिका तो दाखिल करते हैं, लेकिन जानबूझकर अदालत में पेश न होकर दूसरे पक्ष को प्रताड़ित करते हैं।"

उन्होंने कहा कि यह संशोधन, संसद में पेश किए जाने वाले विवाह अधिनियम (संशोधन)विधेयक 2010 के माध्यम से प्रभावी होगा।

विधि आयोग ने अपनी 217वीं रिपोर्ट में तलाक के लिए इस आधार की सिफारिश की थी। सोनी ने इस बदलाव को तर्कसंगत बताते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 में तलाक के जरिये विवाह विच्छेद के लिए कई आधार दिए गए हैं।

इसमें परस्त्रीगमन, अत्याचार, परित्याग, धर्मातरण, दिमागी स्थिति ठीक नहीं होना, ठीक न हो सकने वाला कुष्ठ रोग, संक्रामक रोग, सात साल या उससे अधिक अवधि तक जीवित होने के बारे में सूचना न होना।

विशेष विवाह अधिनियम की धारा 27 में भी इसी तरह के आधार दिए गए हैं।

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी और विशेष विवाह अधिनियम की धारा 28 आपसी सहमति से तलाक का अवसर प्रदान करती है।

सोनी ने कहा, "यह देखा गया है कि आपसी सहमति के आधार पर याचिका दाखिल किए जाने पर भी जब एक पक्ष सुनवाई में उपस्थित नहीं होता तो दूसरे पक्ष को परेशानी झेलनी पड़ती है। ऐसे में तलाक की प्रक्रिया भी अधूरी बनी जाती है।"

उन्होंने कहा कि इससे उस पक्ष को बेहद कठिनाई होती है, जिसे तलाक हासिल करने की बहुत ज्यादा जरूरत हो। इसीलिए ऐसे संशोधन को मंजूरी दी गई है।

सोनी ने कहा विधि आयोग की सिफारिश के अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने भी दो अवसरों पर व्यवस्था देते हुए सिफारिश दी है कि किसी भी सुलह के जरिए शादी न बचा पाने को भी तलाक का आधार बनाया जाना चाहिए।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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