भोपाल गैस कांड : जनता ने आरोपियों के पुतलों को दी फांसी

भोपाल। देश की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड के 25 साल बाद अब आरोपियों को सजा सुनाए जाने की घड़ी करीब आ गई है। सात जून को आने वाला फैसला चाहे जो हो, मगर पीड़ितों को आरोपियों के लिए मौत की सजा से कम का फैसला सुकून नहीं देगा। वे तो एक नहीं कई बार मौत की सजा की चाहत रखते हैं और यही कारण है कि उन्होंने आरोपियों के पुतले ही फांसी के फंदे पर टांग दिए हैं।

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यूनियन कार्बाइड से रिसी गैस के कारण काल बनकर आई दो-तीन दिसम्बर 1984 की रात को यहां के लोग अब भी नहीं भुला पाए हैं। अपनों को खोने का गम के साथ मिली बीमारियां उन्हें तिल-तिल मरने को मजबूर किए जा रही है। बीते 25 सालों में गैस पीड़ितों को प्रदेश और केंद्र की सरकारों से सिर्फ निराशा ही हाथ लगी है। मुआवजा और राहत के नाम पर चंद हजार रुपये ही उन्हें हासिल हो पाए हैं।

नहीं मिलेगी कड़ी सजा

गैस पीड़ितों के जारी संघर्ष की कड़ी में सीबीआई की ओर से आरोपियों के खिलाफ दायर आपराधिक मामले पर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मोहन पी. तिवारी की अदालत सात जून को फैसला सुनाने जा रही है। सीबीआई की ओर से यह प्रकरण एक दिसम्बर 1987 को न्यायालय मे पंजीबद्ध कराने के बाद आरोप पत्र दायर किया गया था। पीड़ितों का आरोप है कि इस मामले को सीबीआई लगातार कमजोर बनाने की कोशिश करती रही।

गैस पीड़ितों की लड़ाई लड़ने वाले भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार कहते हैं कि सात जून को आने वाला फैसला देश के लिए नजीर बनेगा। इतना ही नहीं आगामी समय में औद्योगिक हादसों के लिए दोषी कौन होगा, यह भी तय करने में यह फैसला महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। वे जानते हैं कि इस फैसले से आरोपियों को बड़ी सजा नहीं मिलने वाली क्योंकि सीबीआई ने मामला ही कमजोर बनाया है।

वहीं भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति की साधना कार्णिक का कहना है कि अधिकांश गैस पीड़ितों को न्यायालय में चल रहे मामले में मिलने वाली सजा का अंदाजा ही नहीं है लिहाजा वे बड़ी उम्मीद लगाए हैं जबकि आरोपियों को ज्यादा सजा नहीं मिलने वाली है।

न्याय के लिए तरसते लोग

हमीदा बी के परिवार के 30 से अधिक सदस्यों को गैस कांडने निगला था। वह आज भी यूनियन कार्बाइड और वारेन एंडरसन का जिक्र आते ही भड़क उठती है। उनका कहना है कि इस कंपनी ने सिर्फ उनके ही नहीं हजारों परिवारों की जिंदगी को तबाह कर नरक बना दिया है। वहीं भारत सरकार इन आरोपियों को सजा दिलाने की बजाय बचाने का काम कर रही है। त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोगों को भारतीय कानून के मुताबिक सजा दी जानी चाहिए। इन्होंने गुनाह तो इतना बड़ा किया है कि मौत की सजा एक बार नहीं कई बार दी जानी चाहिए।

वहीं जेपी नगर में रहने वाली प्रमिला के लिए तो गैस कांड ने जिंदगी को बोझ बना दिया है। गैस के कारण मिली बीमारी के कारण उसे ससुराल से निकाल दिया गया और आज वह दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष किए जा रही है। वह कहती है कि यह फैसला उसके जख्मों पर मरहम लगाने वाला होगा। सिर्फ वह ही नहीं हर कोई चाहता है कि आरोपियों को चौराहे पर फांसी दी जाए।

पीड़ितों के आक्रोश का अंदाजा बस्तियों का जायजा लेने से ही लग जाता हैं। यही कारण है कि फैसला आने से पहले ही सभी आठ आरोपियों के पुतलों को फांसी के फंदे पर टांग दिया गया है। इतना ही नहीं अदालत से भी लोग यही अपेक्षा कर रहे है आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।

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