टीवी चैनलों का 'जागरूकता अभियान'

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क्या आपको पता है कि आजकल हमारे टीवी चैनलों को क्या भा रहा है? नहीं पता, तो चलिए हम आपको बता देते हैं। आजकल हमारे टीवी चैनलों को 'द' शब्द से मोहब्बत हो गई है। मैं बात कर रही हूं 'द' शब्द से उच्चारित 'दबे हुए' शब्द की, जिस पर आजकल सभी टीवी चैनलों का दिल आया हुआ है।

थोड़ा सा गौर फरमाइये आज कल हर चैनल पर जो सीरियल धूम मचाये हुए हैं वो सभी किसी न किसी जाति की समस्या या किसी कुप्रथा को उजागर करते हैं। जिन पर कोई न कोई शासन करता है। जैसे, बालिका-वधू , 'काशी न रहे तेरा कागज कोरा', 'अगले जन्म मोहै बिटिया ही कीजो', ' बैरी पिया' , 'गंगा अग्निपरिक्षा जीवन की' आदि आज ऐसे कार्यक्रम हैं जो समाज के एक तबके की समस्या को उजागर करते हैं। ये तबका ऐसा है जो बेहद गरीब है, जिसके पास जीविका के पर्याप्त साधन नहीं हैं।

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कहीं कोई साक्षर नहीं हो पा रहा है क्योंकि वो एक दलित तबके से सम्पर्क रखता है तो कहीं आज भी बाल विवाह जैसी कुप्रथा का प्रचलन हैं, तो कहीं कोई सीरियल ये दिखाता है कि भले ही आज देश आजाद हैं लेकिन गांवों में आज भी ठाकुरों औऱ जमींदारों की हुकूमत चलती है।इमेजिन चैनल पर प्रसारित होने वाला 'जमुनिया' धारावाहिक ये साबित करता है कि आज भी स्वार्थ और अंधविश्वास की चिता पर लड़कियां ही फूंकी जाती है। तो वहीं 'गंगा अग्निपरिक्षा जीवन की' में सफेद दाग जैसी समस्या को उजागर किया गया है।

कहने का मतलब यह है कि ये कार्यक्रम समाज में फैली हुई बुराइयों को उजागर करते हैं जिनसे हमारे समाज का एक वर्ग रोज प्रभावित होता है। चैनलों ने भले ही ऐसे कार्यक्रम टीआरपी के चक्कर में प्रसारित किये गए हों लेकिन इन सब का फीड बैक काफी अच्छा है। यकीन नहीं हो रहा है आपको चलिए आपको अपना अनुभव बताती हूं, आज कल हमारे घर में काम करने वाली महिला की बच्ची को मेरा छोटा भाई पढ़ाता है, जिसकी उम्र महज 13 साल की है,उसका कहना है कि दीदी हमारे देश में सभी को पढ़ने का अधिकार है अगर मेरे घर काम करने वाली महिला के पास इतने पैसे नहीं है कि वो अपनी बच्ची को स्कूल भेज सके तो क्या हुआ मैं तो उसे पढ़ा सकता हूं, और मैं ऐसा करूंगा क्योंकि 'काशी न रहे तेरा कागज कोरा' में यही दिखाया जा रहा है।

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अक्सर टीवी अपने प्रसारित कार्यक्रमों के कारण आलोचना का शिकार रहता है लेकिन पिछले चंद महीनों से प्रसारित हो रहे ऐसे जागरूक प्रोग्रामों की वजह से लोगों के प्यार से सराबोर है। जिसका ताजा उदाहरण इन कार्यक्रमों की जबरदस्त सफलता है। जो ये साबित करते हैं कि आज भी लोग हर कुछ देखना पसंद नहीं करते हैं। सीरियल्स में प्रसारित होने वाले ऐसे सामाजिक मुद्दे जिनका अंत बहुत जरूरी है, उनका मुकाबला लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के साथ मिलकर किया जाये तो निश्चित तौर पर सफलता हासिल होगी।

तो ये है हमारे टीवी चैनलों को 'डी' प्रेम, कहते हैं प्रेम ऐसी शक्ति है जिसके आगे हर कोई सजदा करता है, और प्रेम के द्वारा ही बड़ी से बड़ी लड़ाई जीती जा सकती है, प्यार से ही बुराई का अंत हो सकता है, तो चलिए हम भी ऊपर वाले से ये ही दुआ करें कि हमारे टीवी चैनल इसी तरह जागरूकता भरे धारावाहिक दिखाते रहें ताकि हमारे दर्शक अपने समाज में फैली हुई अज्ञानता रूपी बीमारी से अवगत हों और उसे दूर करने के ठोस कदम उठाये।

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