इमारतों से नष्ट हो रहा चित्कूल का सौंदर्य
चित्कूल (हिमाचल प्रदेश), 25 मई (आईएएनएस)। लकड़ी से बने घरों के लिए मशहूर हिमाचल के गांव चित्कूल का सौंदर्य तेजी से समाप्त हो रहा है। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले का यह गांव चीन की सीमा के नजदीक पड़ता है। यहां बन रहीं बहुमंजिली इमारतें इसके सौंदर्य को नष्ट कर रही हैं।
पेंड़ काटे जाने पर लगे प्रतिबंध और लकड़ी की महंगाई के चलते स्थानीय लोग अब ईंट और पत्थरों (कंक्रीट) से मकान का निर्माण करा रहे हैं, जिससे इस गांव का मूल स्वरूप और प्राकृतिक व सांस्कृतिक सौंदर्य विकृत हो रहा है। समुद्र तल से 11,319 फिट की ऊंचाई पर स्थित चित्कुल सड़क से जुड़ने वाला इस क्षेत्र का अंतिम गांव है।
गांव के दुकानदार नरेश ठाकुर ने आईएएनस से कहा, "हम जानते हैं कि गांव अपना अप्रतिम सौंदर्य खो रहा है, लेकिन इसके लिए हम जिम्मेदार नहीं है। राज्य सरकार द्वारा पेड़ों के काटे जाने पर रोक लगाने और लकड़ी महंगी होने से गांव वालों के पास इमारतों के निर्माण के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।"
वहीं, गांव के एक बुजुर्ग ने इमारतों के निर्माण के लिए 'बाहरी लोगों' को दोषी ठहराया।
बुजुर्ग ने कहा, "स्थानीय लोगों ने होटलों और विश्राम घरों के निर्माण के लिए अपनी जमीन पट्टे पर बाहरी लोगों को दे दी है। इस गांव के प्राकृतिक सौंदर्य को नष्ट करने के लिए व्यवसायीकरण ज्यादा जिम्मेदार है।"
चित्कुल से बर्फ से ढके किन्नर कैलाश चोटियों का सौंदर्य शानदार दिखता है। सतलुज से निकलने वाली बस्पा नदी इसके पास से निकलती है, जो इसके सौंदर्य को कई गुना बढ़ाती है। राजधानी शिमला से 250 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह क्षेत्र वन्य जीवन की विविधता से परिपूर्ण है।
बेंगलुरू से आए पर्यटक अभिजीत चटर्जी ने कहा, "बहुमंजिली इमारतों के कारण 10 वर्षो में इस गांव का दृश्य ही बदल गया है। वर्ष 2000 में हम बगीचों के बीच लकड़ी से बने घर में ठहरे थे।"
उनकी पत्नी रेनू ने कहा, "बड़ी संख्या में हो रहे इमारतों के निर्माण ने चित्कुल के सौंदर्य को नष्ट कर दिया है। हम यहां इसके प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ उठाने आए थे, लेकिन हमें निराशा हाथ लगी।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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