बड़ा और सुखी परिवार

Hiralal
इर्शादुल हक़, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

भारत में संयुक्त परिवारों की ख़त्म होती परंपरा और छोटे परिवारों के बढ़ते चलन के बीच अभी भी कई ऐसे परिवार हैं जिनके सदस्यों की संख्या चालीस-पचास है. ऐसा ही एक परिवार है पटना का साह परिवार. पटना के एक बड़े व्यापारिक घराने की चार पीढ़ियों पर आधारित यह संयुक्त परिवार 80 वर्षीय हीरालाल साह का कुनबा है जो एक भव्य कोठी में रहता है. परिवार में हीरालाल के पुत्र, पुत्रवधु की बात ही क्या, पौत्र, पौत्रवधु और उनके बच्चे बराबर उत्सवी माहौल में रहते हैं.

अन्तरराष्ट्रीय परिवार दिवस के मौक़े पर हीरालाल साह यह बताते हुए गर्वान्वित महसूस करते हैं कि आज जब संयुक्त परिवार का चलन ख़त्म होता जा रहा है, ऐसे में उनका परिवार एक मिसाल है जिसमें आज भी परिवार के 41 सदस्य एक साथ रहते हैं. ये सदस्य हैं- हीरालाल साह दम्पति के सात बेटे ओम प्रकाश साह, रमण साह, शंभु साह, रामजी साह, लक्ष्मण साह, भरत साह, नारायण साह, उनकी पत्नियाँ और चार पौत्र तथा उनकी पत्नियाँ और फिर उनके बच्चे. इस कुनबे में वो छह पोतियाँ शामिल नहीं हैं जो ब्याही जा चुकी हैं.

हीरालाल साह कहते हैं, "हम तो स्वर्ग का आनंद ले रहे हैं. जब अपने कुनबे को देखते हैं तो आँखों से खुशी के आँसू छलक जाते हैं. उम्र के आख़िरी पड़ाव में भगवान से बस यही प्रार्थना है कि मैं अपनी जिंदगी की आखिरी साँस भी इस एकजुट संयुक्त परिवार में ही लूँ". वो कहते हैं “भले ही किसी को मेरा परिवार एक करिश्मा जैसा लगता हो लेकिन इस परिवार के एकजुट रहने के कई कारण हैं. हमारी आर्थिक सम्पन्नता और पारम्परिक कारोबार का विस्तार सिर्फ़ पटना में होना इसका एक महत्वपूर्ण कारण है. मेरी कोई बेटी नहीं है और हमारी सभी बहुएँ बेटियों की तरह हैं साथ ही साथ हमने जो शिक्षा अपने बच्चों की दी है उसका मूल मंत्र ही है कि हम हर हाल में एक रहेंगे".

वैसे तो साह परिवार के प्रत्येक सदस्य का अलग-अलग कारोबार है और सबकी ज़िम्मेदारियाँ भी बंटी हैं लेकिन सभी लोग अपने कारोबार में अपने परिवार के मालिक हीरालाल साह के प्रति जवाबदेह हैं. चूँकि कारोबार और उत्तरदायित्व के लिए अलग-अलग व्यस्त समय है इसलिए दिन का खाना भले ही सब अपनी सुविधानुसार खाते हैं लेकिन रात में सब एक साथ होते हैं. सुबह हीरालाल साह के नेतृत्व में दिन भर का कार्यक्रम तय होता है और सभी अपने-अपने काम में लग जाते हैं.

पौत्रवधु ऋचा साह अपने दादा हीरालाल साह की देखभाल करने में कोई कसर नहीं छोड़तीं. उन्हें कब किस दवा की ज़रूरत है और खाने में उन्हें क्या लेना है, ये सारी ज़िम्मेदारी उन्हीं की है. ऋचा कहती हैं, “हमारा परिवार भावनाओं के एक ऐसे धागे से बंधा है जिसमें सबके दिलों में एक दूसरे के प्रति त्याग और समर्पण है". कांता साह इस परिवार की सबसे बड़ी बहू हैं और हीरालाल दम्पति के बाद इस घर की सबसे महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी उन्हीं के माथे पर होती है. कांता कहती हैं, " ऐसा नहीं है कि अनबन नहीं होती है लेकिन हम नकारात्मक पहलुओं पर कभी ध्यान नहीं देते और यही कारण है कि हम एक साथ ख़ुश रहते हैं".

सभी पारम्परिक परिवार की तरह इस परिवार में भी आपसी मनमुटाओं और तकरार होना दैनिक जीवन का हिस्सा है. झगड़ा आमतौर पर बच्चों की आपसी तकरार से शुरू होता है लेकिन इससे निपटने के लिए परिवार के किसी एक सदस्य का फ़ैसला मान्य होता है. और इसपर भी सहमति नहीं बनी तो हीरालाल साह के पास शिकायतों के निपटारे का आख़िरी मंत्र होता है. कांता कहती हैं कि आपसी विश्वास और सामूहिक ज़िम्मेदारी से हमें एक साथ रहने की प्रेरणा मिलती है.

वहीं हीरालाल साह के पुत्र रामजी साह कहते हैं, ''कभी-कभी हम संयुक्त परिवार के नुकसान पर ज़रूर ग़ौर करते हैं.इसलिए हमने अपने कारोबार की ज़िम्मेदारियों को विभाजित कर दिया है.हाँ, कभी-कभी ऐसे लगता है कि कुछ सदस्य अपनी जिम्मेदारियों को बख़ूबी निभाने में कोताही करते हैं लेकिन जब हम सभी पहलुओं पर ग़ौर करते हैं तो पाते हैं कि कुछ मुद्दों पर हमें समझौतावादी होना ही चाहिए.""

हीरालाल साह परिवार को काफ़ी निकट से जानने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार अनिल कुमार कहते हैं कि साह परिवार के सदस्यों की संख्या इतनी अधिक हो गई है कि इस परिवार को अब अलग होना ही पड़ेगा. वह कहते हैं हीरालाल साह काफ़ी बूढ़े हो चुके हैं और संभव है कि उनकी मौत के बाद इस परिवार में बिखराव आ जायेगा. मारवाड़ी समुदाय से ताल्लुक रखने वाला साह परिवार तकरीबन 120 वर्ष पहले राजस्थान से पटना आया था और अब यहीं का होकर रह गया है.

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