'पंचायतों और नगरपालिकाओं में ओबीसी आरक्षण वैध' (लीड-1)
नई दिल्ली, 11 मई (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने पंचायतों में, नगर पालिकाओं में और इन संस्थाओं के अध्यक्ष जैसे एकल पदों पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण देने के संवैधानिक प्रावधान की वैधता को मंगलवार को सही ठहराया है।
अदालत ने यह भी कहा कि इन संस्थाओं के अध्यक्ष पद को सरकारी नौकरियों में एकल पदों के समकक्ष नहीं माना जा सकता।
अदालत ने हालांकि कहा, "स्थानीय स्वशासन के संदर्भ में अनुसूचित जातियों एससी, अनुसूचित जनजातियों एसटी, और ओबीसी के लिए निर्धारित अधिकतम 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को नहीं तोड़ा जा सकता।"
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 243-डी (6) और अनुच्छेद 243-टी (6) इसलिए संवैधानिक रूप से वैध हैं, क्योंकि इसके प्रावधान कुछ इस तरह के हैं, जो राज्य विधानसभाओं को इस बात के लिए अधिकृत करते हैं कि वे पिछड़े वर्गो के पक्ष सीटों तथा अध्यक्ष के पदों को आरक्षित करें।
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 243-डी और अनुच्छेद 243-टी सकारात्मक कार्रवाई के लिए एक अलग और स्वतंत्र संवैधानिक आधार निर्मित करते हैं।
प्रधान न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति आर.वी.रवींद्रन, न्यायमूर्ति डी.के.जैन, न्यायमूर्ति पी.सथशिवम और न्यायमूर्ति जे.एम.पांचाल की संविधान पीठ ने कहा, "स्थानीय स्वशासन के संदर्भ में आरक्षण का उद्देश्य और उसकी प्रकृति उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी में आरक्षण के उद्देश्य और उसकी प्रकृति से अपेक्षाकृत भिन्न हैं।"
सर्वोच्च न्यायालय ने जाति आधारित जनगणना का भी स्पष्ट तौर पर पक्ष लिया। अदालत ने कहा कि राज्य विधानसभाओं के तहत पिछड़ी जातियों को दिए गए आरक्षण की मात्रा को अधिक बताए जाने के दावों का परीक्षण नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'समकालीन अनुभवजन्य आंकड़े' मौजूद नहीं हैं।
अदालत ने कहा, "यह शासन की जिम्मेदारी है कि वह पिछड़ेपन की प्रवृत्ति का पता लगाने के लिए एक गहन जांच-पड़ताल कराए। क्योंकि यह प्रवृत्ति राजनीतिक भागीदारी के रास्ते में रोड़ा बना हुआ है।"
अदालत ने कहा, "हमारी राय यह है कि अनुच्छेद 243-डी (6) और अनुच्छेद 243-टी (6) के तहत पिछड़े वर्गो की पहचान, अनुच्छेद 15 (4) के उद्देश्य के लिए एसईबीसी की पहचान तथा अनुच्छेद 16 (4) के उद्देश्य के लिए पिछड़े वर्गो की पहचान अलग होनी चाहिए।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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