बगैर सहमति के नार्को परीक्षण नहीं : सर्वोच्च न्यायालय (लीड-1)
प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति आर. वी. रवींद्रन और न्यायमूर्ति जे. एम. पंचाल की पीठ ने अपने इस फैसले में कहा कि बगैर सहमति के इन परीक्षणों का किया जाना व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता में अनुचित दखलंदाजी है।
अदालत ने कहा कि बलपूर्वक ऐसे परीक्षण संविधान की धारा 20 (3) का उल्लंघन है। इसके तहत प्रावधान है कि किसी मामले में किसी भी आरोपी को स्वयं के खिलाफ गवाही देने को बाध्य नहीं किया जा सकता है।
इस फैसले में यह भी कहा गया कि यदि कोई व्यक्ति खुद को निरपराध साबित करने के लिए स्वैच्छा से नार्को, पोलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराता है, तो इस परिस्थिति में भी मानवाधिकार आयोग के दिशा- निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए।
बालाकृष्णन ने कहा कि ऐसे परीक्षणों के दौरान आरोपी द्वारा अपराध की स्वीकारोक्ति अदालतों में सबूत के तौर पर मान्य नहीं होगी।
अंडरवर्ल्ड की दुनिया में गॉडमदर के नाम से मशूहर संतोकबेन जडेजा और माफिया सरगना अरुण गवली ने इन परीक्षणों की वैधता को चुनौती दी थी। दोनों की याचिकाओं पर न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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