माओवादियों की हड़ताल से ठप हुआ नेपाल
सोमवार की सुबह प्रदर्शनकारियों की अगुवाई कर रहे माओवादी सांसद अग्नि प्रसाद सपकोटा ने कहा, "हमारे लोग राजधानी नहीं छोड़ेंगे।" हड़ताल के चलते देश की परिवहन व्यवस्था, उद्योग, व्यापार, बाजार और शिक्षण संस्थान बंद कर दिए गए हैं।
सपकोटा ने अपने सर्मथकों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा, "यदि जरूरत पड़ी तो हम हड़ताल को एक साल, दो साल तक बढ़ाएंगे।"
हजारों प्रदर्शनकारियों ने पूरे देश में बाजारों और सरकारी दफ्तरों को बंद करा दिया है। नेपाल को भारत और चीन से जोड़ने वाले प्रमुख राजमार्गो को हड़तालियों ने जाम कर दिया है।
भारत के पश्चिम बंगाल से खाद्यान्न सामग्री और जरूरी चीजें लेकर जाने वाले हजारों ट्रक जोगबनी सीमा चौकी के पास खड़े हैं। जानकारी के मुताबिक यहां करीब 5,000 भारतीय फंसे हुए है।
राजमार्गो और सड़कों पर गाडियों को रोक दिया गया है केवल साइकिल सवार, कूटनीतिज्ञों, पत्रकारों और जरूरी सेवाएं देने वाले लोगों को सड़कों से गुजरने की छूट दी गई है।
माओवादियों के उप-प्रमुख और पूर्व वित्त मंत्री बाबूराम भट्टाराई ने कहा, "हमारी हड़ताल शांति प्रक्रिया, नए संविधान और नई विधायिका के नियमों के अनुरूप है। बातचीत का माहौल सिर्फ तभी बन सकता है जब नेपाली प्रधानमंत्री अपना इस्तीफा दे देंगे।"
हालांकि सरकारी सूत्रों ने इस्तीफे की संभावना से इंकार किया है। उनका कहना है कि सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों की मांगें मानने से लोकतांत्रिक व्यवस्था में गलत परंपरा का सृजन होगा।
नेपाली सरकार ने माओवादियों से हड़ताल खत्म करके शांति वार्ता पर ध्यान देने को कहा है। साथ में उन्हें चुनौती दी है कि उनमें हिम्मत है तो वे संवैधानिक व्यवस्था के तहत अलग हो जाएं।
इसके लिए माओवादियों को 601 सदस्यों वाली संसद में 301 सांसदों की जरूरत होगी। माओवादी 30 फीसदी सदस्य संख्या के साथ संसद में सबसे बड़ी पार्टी हैं लेकिन नेपाली प्रधानमंत्री को दूसरी सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस का समर्थन होने से माओवादियों के पास बहुमत नहीं है।
नेपाल में संयुक्त राष्ट्र अधिकार एजेंसी के प्रमुख रिचर्ड बेनेट ने कहा कि यह हड़ताल पूरी तरह शांतिपूर्ण है लेकिन इससे पड़ रहा असर चिंताजनक है। उन्होंने कहा, "यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति ज्यादा समय तक नहीं चल सकती।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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