सुरक्षाकर्मियों से कुछ सहयोग-समर्थन मिला: माओवादी

सुरक्षाकर्मियों से कुछ सहयोग-समर्थन मिला: माओवादी

उत्तर प्रदेश पुलिस ने छापे मारकर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के छह जवानों को गिरफ़्तार किया है और उनसे असला बरामद किया है. ये भी कहा गया है कि ये असला माओवादियों या नक्सलियों के लिए हो सकता है.

बीबीसी संवाददाता अतुल संगर ने सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता डंडाकरण स्पेशल ज़ोनल कमेटी के प्रवक्ता गुड़सा हुसैंडी से इस संदर्भ में बातचीत की है. पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:

हम अपने हथियार और गोला-बारूद मुख्य रूप से पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर हमलों के ज़रिए हासिल करते हैं और यही हमारा अहम स्रोत है. ये सही है कि हम कुछ हथियार अलग-अलग लोगों से भी ख़रीदते हैं लेकिन ये कहना मुश्किल कि कब कहाँ से ख़रीदा होगा – या फिर सीआरपीएफ़, ग्रे हाउंड या कोबरा कमांडो ने दिया होगा.

नहीं, जैसे मैंने कहा, हथियारों और असले का मुख्यत: स्रोत तथाकथित सुरक्षाबलों पर हमारे हमले हैं. दंतेवाड़ा के हमले में हमने 75 हथियार और गोलियाँ हासिल की थी. कम संख्या में हथियार और गोला-बारूद हमें और लोगों से भी मिलता है. जिस तरह से व्यापारी से ख़रीद की जाती है वैसे ही हम असला-बारूद ख़रीदते हैं.

देखिए इस संदर्भ में प्रशासन में छोटे स्तर काम कर रहे जवान, पुलिकर्मियों, अधिकारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है और उन्हें देशद्रोही के रूप में पेश किया जा रहा है. असली देशद्रोहियों और घोटाले करने वालों को तो कुछ कहा ही नहीं जा रहा है.

घुसना क्या? ये तो हमारा कर्तव्य है कि पुलिस, अर्धसैनिक बलों, सेना में काम करने वालों पर काम करें, क्रांति के लिए उनमें समर्थक बनाएँ. क्योंकि वो लोग भी ग़रीब परिवारों से हैं और मज़दूर-किसान के बेटे हैं.

संख्या तो नहीं बता सकता लेकिन अलग-अलग लोग अलग-अलग तरह से सहयोग समर्थन देते हैं. दंडकारण्य के बारे में बता सकता हूँ - कुछ पुलिस जवान और एसपीओ थानों से फ़रार होकर गोला-बारूद और हथियार के साथ हमारे साथ मिले थे. इक्के-दुक्के ही सही कुछ लोगों ने तो हमें हथियार और गोलियाँ भी दी हैं.

ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद होना चाहिए. निर्दोष लोगों को निशाना बनाना बंद होना चाहिए. ये दमन का सिलसिला बंद हुआ तो दंतेवाड़ा जैसी कार्रवाई करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी......हमने हथियार इसलिए नहीं उठाया कि कोई बातचीत का न्योता लेकर आए और हम हथियार डाल दें.

हमने हथियार किन हालात में कब उठाया ये समझना ज़रूरी है. पहले हथियार का इस्तेमाल सरकार ने जनता पर किया और हमने उसके बाद ही हथियार उठाया. नक्सलबारी के समय तो लोग तीर-धनुष लेकर ही निकल पड़े थे रैली निकालने के लिए…

हम भी यही कहते हैं. हमने जो आंदोलन खड़ा किया उसका आधार ही जनता है. दंडाकारण्य में आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया था जिसमें 24 हज़ार लोगों ने भाग लिया. इतने थाने खोलने के बावजूद भी बड़ी संख्या में लोग हमारे कार्यक्रमों में भाग लेते हैं.

लेकिन यदि सरकार को दमनकारी नीतियों पर ही चलना चाहती है और जुलूस, रैलियों और जनसभाओं पर पाबंदियाँ लगाती है, जनसंगठनों पर प्रतिबंध लगाती है तो बाहर बैठे लोगों को हमारे आंदोलन का केवल सशस्त्र प्रतिरोध का रूप ही दिखता है.

जो हम जनांदोलन कर रहे हैं उसकी रिपोर्टिंग नहीं होती है. दस फ़रवरी को भूमकाल दिवस मनाया गया. कई जगह सभाएँ हुई और हर जगह दस-दस हज़ार लोगों ने भाग लिया. ये कहना कि सशस्त्र संघर्ष अलग और जनांदोलन अलग चल रहे हैं सही नहीं होगा.

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