हिमाचल में चेरी की रिकॉर्ड पैदावार की उम्मीद
विशाल गुलाटी
शिमला, 25 अप्रैल (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश के चेरी उपजाने वालों को उम्मीद है कि इस साल की पैदावार पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। राज्य में चेरी की कुल पैदावार 900 टन तक पहुंच जाने का अनुमान है।
बागवानी विभाग के अनुसंधान अधिकारी दौलत राम ने आईएएनएस को बताया, "जाड़े से लेकर गर्मी तक का मौसम फसल के लिए अनुकूल रहा है इसलिए चेरी की पैदावार के मामले में राज्य नए रिकॉर्ड बनाने की ओर बढ़ रहा है।"
उन्होंने कहा कि प्रदेश भर से मिल रही रिपोर्टों के हिसाब से करीब 900 टन चेरी की पैदावार का अनुमान है। पिछले वित्त वर्ष में राज्य में 419 टन चेरी की पैदावार हुई थी जबकि 2007-08 के दौरान चेरी की कुल पैदावार 698 टन थी।
कुल्लू के पास बागवानी करने वाले हिम किरण मांता कहते हैं कि इस साल न केवल अच्छी पैदावार की उम्मीद है बल्कि चेरी का रंग भी बेहतर दिख रहा है।
शिमला, कुल्लू, मनाली, चंबा, किन्नौर, लाहौल और स्पीति जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्र चेरी की पैदावार के लिए सबसे उपयुक्त हैं। यहां करीब 10,000 छोटे किसान 405 हेक्टेयर क्षेत्र में वैकल्पिक फसल के रूप में चेरी उपजाते हैं।
सोलन के वाई. एस. परमार विश्वविद्यालय के पूर्व संयुक्त निदेशक एस. पी. भारद्वाज के अनुसार सेब की बागवानी करने वाले अब चेरी का रुख करने लगे हैं। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि अगर ज्यादा ठंडी का मौसम कम समय के लिए भी रहे तो भी चेरी की पैदावार पर फर्क नहीं पड़ता।
वह बताते हैं कि फूल आने से पहले (मार्च-अप्रैल) सेब की फसल को 1,200 से 1,600 घंटे की ऐसी ठंड चाहिए जब तापमान सात डिग्री सेल्सियस या इससे कम हो। वहीं चेरी के लिए करीब 700 घंटे की कड़ाके की ठंड वाले समय की जरूरत होती है। कीमतों के लिहाज से भी सेब की तुलना में चेरी ज्यादा लाभकारी है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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