जीएसएलवी डी 3 का प्रक्षेपण विफल
भारत
ने जीएसएलवी डी 3 का श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपण किया लेकिन प्रक्षेपण यान अपने निर्धारित रास्ते पर उड़ान पूरी नहीं कर सका. इस बारे में जानकारी देते हुए इसरो के चेयरमैन के राधाकृष्णन ने कहा कि प्राथमिक आंकड़ों से हम यह कह सकते हैं कि प्रक्षेपण वाहन अपने निर्धारित रास्ते पर नहीं है. id="toptextpromo">उनका
कहना था, '' जो हम देख सकते हैं उससे लगता है कि वाहन का नियंत्रण ख़त्म हो गया है. अभी हमारे पास कम आंकड़े हैं. पूरे आंकड़े आने पर जांच होगी."" राधाकृष्णन का कहना था कि अभी यह अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि क्रायोजेनिक इंजन के निचले हिस्से में दो वर्नियर इंजन होते हैं और संभवत ये इंजन शुरु नहीं हो पाए. उन्होंने कहा, ''यह देखना होगा कि ये छोटे इंजन क्यों नहीं शुरु हुए लेकिन इसके लिए भी आकड़ों की ज़रुरत है. ""जीएसएलवी डी 3 यानी जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लांच वेहिकल पहली बार घरेलू क्रायोजेनिक टेक्नॉलॉजी के ज़रिए प्रक्षेपित किया गया था और प्रक्षेपण के दौरान कोई समस्या नहीं आई थी. id='are-slot-1' class='oiad oi-axt oiadv'> id='top-searched-articles'>अगर
ये मिशन सफल होता तो भारत अमरीका और रुस जैसे उन पाँच देशों की श्रेणी में शामिल हो जाता जिनके पास इस तरह की तकनीक है. भारतीय वैज्ञानिकों ने इस तकनीक पर 18 साल पहले काम करना शुरु किया था. इसका सफल परीक्षण होने पर भारत दो टन से अधिक के सेटेलाइट का प्रक्षेपण खुद करने में सक्षम हो जाता. इस प्रकार के वाहन अपने सेटेलाइट पृथ्वी से 36000 किलोमीटर ऊपर की कक्षा में ले जाने में सक्षम होते हैं. अमरीका और रुस के अलावा चीन, जापान और फ्रांस के पास ही ये तकनीक है.











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