बस्तर की कला हुई वैश्विक, शिल्पकार बदहाल
अबूजमाद (बस्तर), 6 अप्रैल (आईएएनएस)। धातु की नक्काशीदार घंटियां और लकड़ी व बांस से बने उत्पाद भारत में ही नहीं विदेश में भी कई घरों की शोभा बढ़ाते हैं लेकिन इन्हें बनाने वाले छत्तीसगढ़ के करीब 20,000 जनजातीय परिवार बदहाली की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। वजह साफ है कि इनकी पहुंच सीधे बाजारों तक नहीं है इसलिए बिचौलिए इनकी मेहनत से मालामाल हो रहे हैं।
नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ इलाके की एक 33 वर्षीया शिल्पकार सोनू मांडवी ने आईएएनएस से कहा, "हमारे उत्पादों की मांग देश के कई हिस्सों के साथ-साथ विदेश में भी है लेकिन इसके बावजूद हमारी गरीबी दिनों-दिन भयानक होती जा रही है।"
करीब 40,000 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले जनजातीय बाहुल्य बस्तर क्षेत्र में अबूझमाड़ इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ है और इस क्षेत्र को नक्सलियों का गढ़ माना जाता है।
बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, बस्तर और दंतेवाड़ा जिलों को मिलाकर बने बस्तर क्षेत्र में करीब 20,000 शिल्पकार रहते हैं। इन्हें विश्वस्तरीय हस्तशिल्प उत्पाद बनाने में महारथ हासिल है।
इन शिल्पकारों से उत्पाद खरीदने वाले बिचौलिए और व्यापारी इन्हें बाजार में 20 गुना ऊंची कीमतों पर बेचते हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा सम्मानित शिल्पकार श्यामसुंदर विश्वकर्मा कहते हैं, "यह मुनाफे का व्यापार नहीं है। लोग हमारे उत्पादों की सराहना करते हैं लेकिन बाजारों में सीधी पहुंच न होने के कारण हम अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।"
अबूझमाड़ के भूटाखार गांव की शारदा सलाम कहती हैं, "कुछ सरकारी मदद के बावजूद बढ़ती गरीबी बस्तर के शिल्पकारों को मार रही है। इन चीजों को निर्मित करके हम संपन्न हो सकते हैं लेकिन हमारा मुनाफा बिचौलियों के हाथ में चला जाता है और हम लगातार संघर्ष करते रहते हैं।"
वह कहती हैं कि यदि यही हालात बरकरार रहे तो बस्तर की यह कला खत्म हो जाएगी।
छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास बोर्ड के प्रभारी बी. के. शाहू कहते हैं कि उत्पादों की मांग बढ़ने के साथ-साथ इन लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है हालांकि इसकी रफ्तार काफी धीमी है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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