जीने की ललक जगाती एचआईवी संक्रमित महिला
गोरखपुर, 28 मार्च (आईएएनएस)। एचआईवी संक्रमित होने के बाद एक समय जीवन से हार मान चुकी उत्तर प्रदेश की एक महिला आज दूसरों को जीने के लिए प्रेरित कर रही है।
गोरखपुर जिले के तिलौली गांव की रहने वाली 35 वर्षीय भानुमती(बदला हुआ नाम) ने अपने निरंतर प्रयास से आज 30 लोगों का एक समूह बना लिया है, जो एड्स/ एचआईवी जागरूकता कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार कर रहा है।
30 लोगों के इस समूह में भानुमती के अलावा 17 अन्य एचआईवी संक्रमित महिलाएं हैं, जो जागरूकता कार्यक्रम का संचालन करती हैं।
भानुमती ने आईएएनएस से कहा कि जागरूकता कार्यक्रम का हिस्सा बनकर मुझे बहुत संतुिष्ट मिलती है। मैं अपनी अंतिम सांस तक एचआईवी संक्रमितों से जुड़ी रहकर उनकी सेवा करना चाहती हूं।
तीन साल पहले भानुमती को पता चला था कि वह एचआईवी से संक्रमित है। उस समय उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था क्योंकि उसके पति की दो साल पहले एचआईवी से ही मौत हो चुकी थी।
वह बताती हैं कि मैं खौफ के साये में थी। तिल-तिल कर जी रही थी। डर से घिरी मैं रोज अपनी मौत का इंतजार करती थी। ये सब कुछ करीब एक साल तक चला, जब मुझे एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) गोरखपुर इनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप (जीईएजी) ने प्रेरित किया कि मैं अपनी बची हुई जिंदगी दूसरों की सेवा में लगाऊंगा। एनजीओ के सुझ्झाव ने मानो भानुमती को जीने की एक प्रेरणा और दिशा दे दी।
भानुमती कहती हैं कि एनजीओ के सुझाव को स्वीकारते हुए मैंने पूरी तरह निश्चय कर लिया था कि मैं अपनी तरह के तमाम उन लोगों का हौसला आफजाई करूंगी जो एचआईवी से ग्रसित होने के बाद जीने की राह छोड़ देते हैं।
बाद में भानुमती ने उस एनजीओ के साथ कुछ समय प्रशिक्षण प्राप्त करके जागरूकता कार्यक्रमों का संचालन करना शुरू कर दिया था। आज वह अपने ही नहीं बल्कि आस-पास के दस गांवों में एचआईवी/एड्स जागरूकता और इससे संक्रमित लोगों की काउंसलिंग करती हैं।
भानुमती एक निजी दफ्तर में चपरासी की नौकरी भी करती हैं और अपनी पांच साल की बेटी को स्कूल भेजने के साथ अन्य सारी जिम्मेदारियां उठाती हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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