अब स्टीफेन कोर्ट में भी एक 'कासाबियानका'!
कोलकाता, 28 मार्च (आईएएनएस)। जिस तरह से अंग्रेजी कविता 'कासाबियानका' में एक पुत्र अपने पिता के आदेश का पालन करते हुए जलती जहाज से नहीं हटा था, उसी तरह खुशीराम तिवारी अपने मालिक के आदेश का पालन करते हुए शहर में खाक हुए स्टीफेन कोर्ट इमारत में दो दिनों तक पड़े रहे। इस इमारत में लगी आग से 33 लोग जिंदा जल गए थे।
खुशीराम तिवारी (50) 100 साल पुरानी इस इमारत में पांचवीं मंजिल पर स्थित अपने मालिक के फ्लैट में मंगलवार को गए थे और गुरुवार की शाम तक उस फ्लैट की रखवाली करते रहे। जबकि फ्लैट में उनके पहुंचने के कुछ ही घंटे बाद इमारत में आग लग गई थी।
ब्रिटिश कवि फेलीसिया डोरोथिया हेमान की कविता 'कासाबियानका' में जियोकैंटे ने वर्ष 1798 में अपने पिता के आदेश के बिना फ्रेंच पोत 'ओरिएंट' से हटने से इंकार कर दिया था और पोत में आग लगने के कारण वह भी उसमें खाक हो गया था।
उसी तरह खुशीराम ने कहा, "मेरे मालिक ने मुझे बार-बार आदेश दिया था कि उनके सामानों की बराबर निगरानी करता रहूं। मेरे कपड़े और अन्य समान भी वहीं थे। इसलिए मैं उस फ्लैट में गया था। यह बड़े राहत की बात रही कि फ्लैट सुरक्षित था और सभी सामान अपनी जगह जस के तस थे।"
तिवारी ने कहा, "मैं वहां मंगलवार की देर रात से लेकर गुरुवार अपराह्न् पांच बजे तक रहा। उसके बाद मैं अपने को अकेला महसूस करने लगा था।"
यह पूछे जाने पर कि जिस इमारत में कई शव पड़े रहे हों और जहां एक भी जिंदा व्यक्ति मौजूद न हो, वहां उन्होंने दो रातें कैसे बिताई, खुशीराम ने कहा, "मुझे वहां रहना था। मैं अपने मालिक की संपत्ति का रखवाला था। मैं उनके घर में 10 वर्षो से काम कर रहा था।"
तिवारी ने कहा, "मैं बुधवार को फ्लैट से बाहर नहीं निकला, क्योंकि मैं डरा हुआ था कि यदि मैं दिख गया तो पुलिस मुझे नीचे उतार लेगी।"
और इस दौरान तिवारी ने वहां खाया क्या? "एक आदमी के लिए वहां पर्याप्त भोजन था। पानी भी था। मुझे कोई समस्या नहीं थी।"
खुशीराम के मालिक नरेंद्र कुमार साहनी ने इस बात से इंकार किया है कि इमारत में आग लगने के बाद उन्होंने खुशीराम को फ्लैट में बने रहने के लिए कहा था।
साहनी ने कहा, "मैंने कभी उससे फ्लैट की रखवाली करने के लिए नहीं कहा। वह वहां अपने कपड़े लेने गया था। मुझे नहीं पता कि वह वहां से कब नीचे आया।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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