गुर्दा दान करने से नहीं बढ़ता मौत का खतरा

वाशिंगटन, 15 मार्च (आईएएनएस)। अमेरिका में गुर्दा दान करने वाले जीवित लोगों पर 15 साल की अवधि तक किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि इन गुर्दादाताओं में गुर्दा दान न करने वाले सामान्य लोगों की तरह ही जीवित रहने की दर लंबी होती है।

जब कई मरीजों के गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं तो उन्हें अपनी जिंदगी बचाने के लिए किसी अन्य जीवित व्यक्ति से गुर्दा लेना पड़ता है।

अमेरिका में हर साल 6,000 से अधिक लोग अपने गुर्दे दान करते हैं।

बाल्टिमोर के 'जॉन्स हॉपकिंस युनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन' के डॉरी एल. सीगेव और उनके साथियों ने अमेरिका में एक अप्रैल 1994 से 31 मार्च 2009 के बीच गुर्दादाताओं (80,347) पर अध्ययन किया।

अध्ययन के दौरान पाया गया कि गुर्दा दान करने के 90 दिन के अंदर केवल 25 मौतें हुईं। इस तरह प्रति 10,000 दाताओं में मृत्यु का खतरा 3.1 था जबकि तीसरे 'नेशनल हेल्थ एंड न्यूट्रीशन इग्जैमिनेशन सर्वे' (एनएचएएनईएस-3) के मुताबिक प्रति 10,000 गुर्दादाताओं में मृत्यु का खतरा 0.4 था।

अध्ययकर्ता के मुताबिक शल्य चिकित्सा प्रक्रिया और गुर्दादाताओं के बदलने के बावजूद 15 वर्षो के दौरान शल्य चिकित्सा के दौरान होने वाली मौतों की संख्या में कोई बदलाव नहीं देखा गया।

कम रक्त दाब वाले गुर्दादाताओं की अपेक्षा उच्च रक्त दाब वाले गुर्दादाताओं में शल्य चिकित्सा के दौरान मृत्यु की संभावना अधिक थी।

अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक गुर्दादाताओं में होने वाले मनोवैज्ञानिक परिवर्तन समय से पहले होने वाली मृत्यु के लिए जिम्मेदार नहीं होते हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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