इसराइल और अमरीका में तनातनी

वॉशिंगटन से बीबीसी संवाददाता किम घटास का कहना है कि अमरीका की ओर से ऐसी कड़ी प्रतिक्रिया कभी-कभार ही होती है. नई बस्तियाँ बनाने की इसराइल की घोषणा के कारण शांति वार्ता शुरू करने के उद्देश्य से अमरीकी उप राष्ट्रपति जो बाइडन की यात्रा छिप सी गई. इस फ़ैसले के बाद फ़लस्तीनियों ने संकेत दिया है कि वे उस समय तक बातचीत में शामिल नहीं होगा जब तक इसराइल अपना फ़ैसला वापस नहीं ले लेता. अमरीकी विदेश मंत्रालय का कहना है कि हिलेरी क्लिंटन ने प्रधानमंत्री नेतन्याहू से क़रीब 43 मिनट तक बात की.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता पीटर क्रावली ने कहा कि हिलेरी क्लिंटन ने यह स्पष्ट करने के लिए फ़ोन किया था कि अमरीका इसराइल की इस घोषणा को द्विपक्षीय संबंधों की दिशा में एक नकारात्मक संकेत मानता है. हिलेरी क्लिंटन ने यह भी कहा कि यह घोषणा अमरीकी उप राष्ट्रपति की इसराइल यात्रा की भावना के ख़िलाफ़ है.
क्रावली ने बताया, "हिलेरी क्लिंटन ने यह कहा कि वे यह नहीं समझ पा रही हैं कि ऐसा क्यों हुआ. ख़ासकर उस स्थिति में जब अमरीका इसराइल की सुरक्षा को लेकर हमेशा प्रतिबद्धता व्यक्त करता रहा है." मध्य पूर्व शांति वार्ता के सभी मध्यस्थों अमरीका, रूस, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र- सभी ने इसराइल की घोषणा की आलोचना की है और कहा है कि मॉस्को में 19 मार्च को होने वाली बैठक में इसकी समीक्षा होगी.
हालाँकि इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने घोषणा के समय पर खेद व्यक्त किया था. ये घोषणा ऐसे समय हुई थी जब अमरीकी उप राष्ट्रपति वहाँ बातचीत कर रहे थे. नेतन्याहू का कहना था कि उन्होंने आंतरिक सुरक्षा मामलों के मंत्री इली यिशाई को इस मामले में फटकार भी लगाई है. वर्ष 1967 में पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम पर नियंत्रण के बाद इसराइल 100 से ज़्यादा बस्तियों का निर्माण कर चुका है, जिनमें क़रीब पाँच लाख यहूदी रहते हैं. अंतरराष्ट्रीय क़ानून के मुताबिक़ ये निर्माण अवैध हैं, लेकिन इसराइल इसे सही मानता है.












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