सुपर पॉवर इंटरनेट पर विशेष

Internet Cafe

पीटर हॉरॉक्स

निदेशक, बीबीसी ग्लोबल न्यूज़

बीस साल पहले एक ब्रितानी इंजीनियर ख़ामोशी के साथ दुनिया को बदलने के मुहाने पर खड़ा था. टिम बर्नर्स ली एक ऐसी परियोजना के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने में लगे हुए थे जो वर्ल्ड वाइड वेब बनने वाला था. जैसा कि उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया है कि तब कोई भी इसके महत्व के बारे में कुछ नहीं कह सकता था.

आठ मार्च से बीबीसी टेलीविज़न, रेडियो और बेवसाइट पर विशेष कार्यक्रमों के ज़रिए इस आविष्कार का आकलन कर रही है और यह जानने की कोशिश कर रही है कि यह हमारे जीवन को किस तरह से बदल रहा है.

अंग्रेज़ी के अलावा बीबीसी की 30 से अधिक भाषाओं की सेवाएँ भी इस आकलन में शामिल हैं. ज़ाहिर है बीबीसी हिंदी भी इसका हिस्सा होगी. यह समय है जबकि हम पिछले दो दशकों के तेज़ रफ़्तार परिवर्तनों के बीच एक क़दम पीछे हटकर देखें कि हम कहाँ पहुँच गए और अभी हमें कहाँ तक जाना है.

हमारे कुछ श्रोताओं-पाठकों के लिए वेब उनके जीवन का दुनियावी हिस्सा बन गया है, जबकि कुछ के लिए यह अभी भी दूर की कौड़ी है. हमारा अनुभव चाहे जो भी हो, बीबीसी की कोशिश होगी कि वह अपने पहुँच के ज़रिए एक नए नज़रिए से आप तक अनकही कहानियाँ पहुँचाए.

हम इस विशेष श्रृंखला को 'सुपर पॉवर" कह रहे हैं. 'सुपर पॉवर" एक ऐसा शब्द है जो, हमारी राय में, पिछले दो दशकों की घटनाओं को प्रतिध्वनित करता है.

वह ऐसा समय था जब आयरन कर्टन (सोवियत प्रभाव वाले पूर्वी यूरोप को पश्चिमी यूरोप को अलग करने की कोशिशों के लिए विसेंट चर्चिल का दिया हुआ शब्द) गिर रहा था और दुनिया की ताक़तों के बीच के संबंध, जिसने बीसवीं सदी के पूर्वार्ध को प्रभावित किया था, ख़त्म होने जा रहा था.

दुनिया की महाशक्तियाँ बदल रही थीं और नए ढाँचों के साथ नई शक्तियाँ उभरीं. इस पृष्ठभूमि में वेब बढ़ा-पनपा. और हो सकता है कि नए परिदृश्य पर वेब का असर तब शुरु ही हुआ हो. 'सुपर पॉवर" एक ऐसा अवसर है जब यह पूछा जा सकता है कि इससे आख़िर फ़ायदा किसे हुआ, कौन इस नई ताक़त का उपयोग कर रहा है?

इसका एक उदाहरण हो सकता है, जानकारियों की उपलब्धता. एक दृष्टिकोण है कि सूचनाओं और जानकारियों ने शक्ति की पारंपरिक परिभाषा को बदल दिया और वेब वह पहला माध्यम है जहाँ हर कोई अपनी आवाज़ दुनिया तक पहुँचा सकता है. लेकिन, ज़ाहिर है कि अगर आपको इसमें हिस्सा लेना है तो आपको यह उपलब्ध भी होना चाहिए.

हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ संपन्न भी हैं और विपन्न भी. अभी भी दुनिया का सिर्फ़ एक तिहाई हिस्सा ऑनलाइन है. इसका अर्थ है कि अभी भी चार अरब लोगों के लिए यह अनजानी सी चीज़ है. इस श्रृंखला के दौरान हम इस विषमता की भी पड़ताल करेंगे.

हम अपनी परियोजना के अंतर्गत उत्तरी नाइजीरिया के गिटाटा गाँव पर नज़र रखे हुए हैं जहाँ के लोगों ने अपने मोबाइल फ़ोन के ज़रिए वेब का प्रयोग करने की शुरुआत की है. अबूजा के उत्तर में दो घंटे की दूरी पर स्थित इस गाँव में बिजली नहीं है और इसका बाहरी दुनिया से न्यूनतम संबंध है. तो जब वे पूरी दुनिया से जुड़ जाएँगे तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी?

इसकी उलट भी एक तस्वीर है. इसके लिए हम दक्षिण कोरिया जाएँगे जहाँ दुनिया का सबसे ज़्यादा नेटवर्क उपलब्ध है. वहाँ हमने दो परिवारों को इस बात के लिए राज़ी किया है कि वे दो हफ़्तों तक अपना इंटरनेट कनेक्शन बंद करके देखें. हम देखना चाहते हैं कि वे इंटरनेट पर इस तरह निर्भर दुनिया में बिना इंटरनेट के किस तरह गुज़ारा करते हैं.

हम यह भी देखेंगे कि इस तकनीक ने अलग-थलग पड़े लोगों को किस तरह से जोड़ा है और उन्हें अपना अनुभव बाँटने के लिए इसका उपयोग किया है.

वेब एक ऐसा टूल है जिसने लोगों को उन संस्थाओं और लोगों से जुड़ने में मदद की है, जो पहले आमतौर पर उनकी पहुँच के बाहर थे. दूसरी ओर इसने कुछ संस्थाओं को और अधिक पारदर्शी होने के लिए बाध्य भी किया है. इसको पत्रकारिता में ठीक तरह से महसूस किया जा सकता है.

जब मैंने बीबीसी में काम करना शुरु किया था तब श्रोताओं के साथ हमारा संबंध एकांगी मार्ग हुआ करता था. हम कार्यक्रम बनाया करते थे और फिर कुछ पत्रों की प्रतीक्षा किया करते थे. बस. लेकिन आज, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, श्रोता-पाठक हमारी सोच के केंद्र में होते हैं. वे हमसे लगातार संवाद करते रहते हैं. बीबीसी की विभिन्न सेवाएँ इस दौरान आपके अनुभवों पर भी आपसे चर्चा करेंगीं.

इसके अलावा हम कुछ अप्रिय विषयों पर भी बात करेंगे. इसमें सेंसरशिप है, ऑनलाइन अपराध हैं, साइबर-वॉरफ़ेयर है और कुछ अन्य खेदजनक बाते हैं. बीस साल पहले केवल अत्याधुनिक विज्ञान के बारे में सोचने वाले ही कल्पना कर सकते थे कि दो देश एक दूसरे पर कंप्यूटर कोड के ज़रिए हमला कर रहे हैं. लेकिन अब इंटरनेट की एक आभासी दुनिया में देश एक-एक ईंट और गारा मिलाकर एक आभासी दीवार बनाते हैं और बाहरी हमलों को रोकने का प्रयास करते हैं.

अब दुनिया बदल गई है. बीबीसी की यह श्रृंखला 'सुपर पॉवर" एक अवसर देगी कि हम एक क़दम पीछे हटकर सोचें कि क्या हम इस 'सुपर पॉवर" का हिस्सा बन सके हैं और हम आख़िर इसका करेंगे क्या?

(इस श्रृंखला पर अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजिए [email protected] पर)

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