बचो, अन्यथा खड़ा हो जाएगा ई-कचरे का पहाड़ : रिपोर्ट
यूएनईपी की संचालन परिषद की बैठक के दौरान जारी एक रपट में कहा गया कि अगले 10 वर्षो में भारत, चीन और अन्य विकासशील देशों में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बिक्री बहुत तेजी से बढ़ेगी। इस तरह इनसे निकलने वाले ई-कचरे का पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
रपट के अनुसार, इस समय भारत में रेफ्रिजरेटर से 100,000 टन, टेलीविजन से 275,000 टन, कंप्यूटर से 56,300 टन, प्रिंटर से 4,700 टन और मोबाइल फोन से 1,700 टन ई-कचरा हर साल निकलता है।
रपट का अनुमान है कि 2020 तक पुराने कंप्यूटरों की वजह से इलेक्ट्रॉनिक कचरे का आंकड़ा भारत में 500 फीसदी और दक्षिण अफ्रीका व चीन में 200 से लेकर 400 फीसदी तक बढ़ जाएगा।
वर्ष 2020 तक भारत में मोबाइल फोन से निकला ई-कचरा 2007 की तुलना में 18 फीसदी और चीन में सात फीसदी अधिक होगा।
साथ ही चीन और भारत में टेलीविजन के ई-कचरे में डेढ़ से दोगुना तक इजाफा होगा जबकि भारत में रेफ्रिजरेटर से निकलने वाला इलेक्ट्रॉनिक कचरा दो से तीन गुना तक बढ़ जाएगा।
भारत में असंगठित रूप से पुनर्चक्रण का काम करने वाले लोग सोने जैसी बहुमूल्य धातु हासिल करने के लिए ज्यादातर ई-कचरा जला देते हैं। इससे काफी मात्रा में विषैली गैसें निकलती हैं। इस प्रदूषण के खतरे की तुलना में प्राप्त धातुओं की कीमत हालांकि बहुत कम होती है।
यूएनईपी के कार्यकारी निदेशक और एचीम स्टीनर ने कहा कि अगर ई-कचरे का पुर्नचक्रण असंगठित क्षेत्र द्वारा अनियमितता से किया जाता रहा तो भारत, ब्राजील, मेक्सिको जैसे अन्य विकासशील देशों में पर्यावरण और स्वास्थ्य समस्याएं विकराल हो जाएंगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विश्व में सालाना चार करोड़ टन ई-कचरा पैदा हो रहा है। वहीं, हर साल खनन किए गए सोने और चांदी का तीन फीसदी हिस्सा मोबाइल फोन और कंप्यूटरों के निर्माण में प्रयुक्त होता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
**












Click it and Unblock the Notifications