दुनिया पर फिर मंडराने लगे मंदी के बादल !

इस संभावित संकट की हलचल पिछले दो दिनों से दुनिया के शेयर बाजारों में देखी जा रही है। गुरुवार को अमेरिका का प्रमुख सूचकांक 'डाउ जोंस इंडस्ट्रीयल' 2.61 फीसदी तक लुढ़क गया वहीं शुक्रवार को भारत सहित प्रमुख एशियाई बाजारों में जबर्दस्त गिरावट दर्ज की गई।

अमेरिकी रोजगार बाजार से आए निराशाजनक आंकड़ों और कई यूरोपीय देशों के सरकारी कर्ज के बोझ तले दबे होने के कारण शुक्रवार को यूरोपी बाजार में भी जबर्दस्त गिरावट देखी गई।

समाचार पत्र 'न्यूयार्क टाइम्स' के मुताबिक संभावित संकट उस समय और प्रबल हो गया जब रॉयल बैंक ऑफ स्वीडेन ने निवेशको को भेजे एक नोट में इसका 'संक्रामक प्रभाव बेहद गंभीर' बताया।

बैंक के दो अधिकारी जैक्स कैलॉक्स और हरविंदर सियान ने निवेशकों को भेजे संदेश में लिखा है, "इस क्षेत्र का संकट नए अनुपात में पहुंच गया है और इसका संक्रामक प्रभाव बहुत गंभीर है।"

दरअसल, वर्षो से अनाप-शनाप खर्च कर रही यूरोप की ग्रीस और पुर्तगाल जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया है कि वह इसके भुगतान में अक्षम दिखने लगी हैं। इसी चिंता में पूरे यूरोप के शेयर बाजारों में छह प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि इसकी चपेट में स्पेन जैसे बड़े यूरोपीय देश भी आ सकते हैं।

इस ताजा संभावित वित्तीय संकट को देखते हुए डॉलर के मुकाबले यूरो की कीमत गिरकर 1.37 हो गई है जो पिछले सात माह में सबसे कम है।

अब सवाल यह उठता है कि यह संकट कितना बड़ा है? इस बारे में आईएनजी के वैश्विक विकास प्रमुख उरी डी. लैंड्समैन ने कहा, "अफरा-तफरी क्या है और क्या सही है? इस बारे में हम अभी कुछ नहीं कह सकते।"

अमेरिका की तरह यूरोप भी पिछले वर्ष की मंदी से उबरने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका और यूरोप में सुधार की गति बेहद धीमी है। यूरो मुद्रा का इस्तेमाल करने वाले 16 देशों के समूह में सबसे बड़े फ्रांस और जर्मनी ने अपने वित्तीय संस्थाओं को शीघ्र ही पटरी पर लाने की कोशिश शुरू कर दी है, जबकि ग्रीस, पुर्तगाल, स्पेन और आयरलैंड जो वर्षो से अनियंत्रित खर्च कर रहे हैं उन्हें कर्ज के भुगतान में परेशानी हो रही है।

अब यह देखना होगा कि इस संकट से निपटने के लिए यूरोप क्या कदम उठाता है और इससे उसके राजनीतिक परिदृश्य पर क्या असर पड़ता है। साथ ही इस संभावित संकट के बाद यूरो मुद्रा के भविष्य को भी देखना काफी दिलचस्प होगा।

वैसे आशंकित निवेशक पूछने लगे हैं कि फ्रांस, जर्मनी और अन्य धनी यूरोपीय देशों को क्या अपने गरीब देशों को राहत पैकेज देना चाहिए या फिर उन्हें विफल होते देखना चाहिए।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

*

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+