मनमोहन ने आईपीसीसी का समर्थन किया, कोपेनहेगन पर निराशा जताई (लीड-1)

यहां शुक्रवार को शुरू हुए 10वें दिल्ली सतत विकास सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि कोपेनहेगन में हुए जलवायु सम्मेलन के दौरान हासिल सीमित उपलब्धियों से उन्हें बेहद निराशा हुई है।

प्रधानमंत्री के भाषण का मुख्य हिस्सा दुनिया भर से आए 150 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने सुना।

सिंह ने कहा, " वैज्ञानिक पहलुओं की वजह से आईपीसीसी की आलोचना की जा रही है। लेकिन ग्रीन हाउस गैसों की वजह से तापमान में बदलाव, बारिश और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि जैसे आईपीसीसी के मुख्य मुद्दों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

दिसंबर 2009 में कोपेनहेगन में हुए जलवायु सम्मेलन के बाद यह पहला बड़ा वैश्विक सम्मेलन है। ऊर्जा अनुसंधान संस्थान (टीईआरआई) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन का विषय 'कोपेनहेगन से आगे : सतत विकास के नए रास्ते' है।

प्रधानमंत्री ने कहा, "आईपीसीसी की प्रक्रिया और नेतृत्व पर भारत को पूरा भरोसा है। हम हरसंभव तरीके से इसका समर्थन करेंगे।"

आईपीसीसी पिछले महीने जारी अपनी चौथी आकलन रिपोर्ट की वजह से विवादों में है जिसमें गलती से कहा गया था कि बढ़ते तापमान की वजह से हिमालय के ग्लेशियर 2035 तक पिघल जाएंगे।

एक दिन पहले पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भी विशेष तौर पर ब्रिटिश मीडिया की आलोचना झेल रहे आईपीपीसी के प्रमुख आर.के.पचौरी का समर्थन किया था।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कोपेनहेगन सम्मेलन की सीमित उपलब्धियों पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि हम अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करे।

भारत कोपेनहेगन समझौते का पूरी तरह समर्थन करता है और वह इसे आगे ले जाएगा। उन्होंने कहा कि यह करार विचार विमर्श के बाद निर्धारित विधिसम्मत दायित्व नहीं बल्कि स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं की सूची है।

उन्होंने कहा कि केवल विश्वास के बल पर किया गया महत्वाकांक्षी समझौता इस पूरी प्रक्रिया की साख को प्रभावित करेगा। उन्होंने कहा कि इसमें देशों नेअपनी ओर से प्रतिबद्धताएं यह अनुमान लगाते हुए व्यक्त की हैं कि वे उन्हें पूरा कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि पूरी तरह लागू होने वाला साधारण करार ऐसे महत्वाकांक्षी करार से बेहतर है, जिसमें निर्धारित लक्ष्यों को हासिल ही न किया जा सके। उन्होंने कहा कि क्योटो संधि से यही सबक हमें सीखना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भार वहन करने में भागीदारी में वैश्विक आम सहमति का अभाव किसी समझौते तक पहुंचने में बड़ी बाधा है। उन्होंने कहा कि हमारे नजरिए से औद्योगिक देशों को वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के संग्रहण में अपनी ऐतिहासिक भूमिका पहचाननी होगी।

उन्होंने कहा कि इन देशों को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में अपनी भविष्य की कटौतियों की दिशा ज्यादा मुखर पहल करनी चाहिए। उन्होंने विकासशील देशों को ज्यादा वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया।

इस सम्मेलन में भाग लेने वालों में नार्वे के प्रधानमंत्री जेन्स स्टोलनबर्ग, भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मे योसर थिनले, फिनलैंड के प्रधानमंत्री मैट्टी वेन्हेनन, ग्रीस के जार्ज पापेंड्रेयू, आदि शामिल हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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