श्रीलंका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव मंगलवार को, प्रचार समाप्त (राउंडअप)
श्रीलंका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए मैदान में राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे और पूर्व सेना प्रमुख सरथ फोंसेका के अलावा 20 अन्य उम्मीदवार भी हैं लेकिन मुख्य मुकाबला राजपक्षे और फोंसेका के बीच है और दोनों के बीच कांटे का मुकाबला माना जा रहा है। दोनों मुख्य प्रतिद्वंद्वियों राजपक्षे और फोंसेका द्वारा राजधानी कोलंबो में रैलियों को संबोधित करने के साथ ही चुनाव प्रचार समाप्त हो गया।
सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर उदय नानायक्कारा ने बताया कि पुलिस ने कोलंबो के एक बौद्ध मंदिर पर छापा मारकर वहां से 56 हथगोले, दो एके-56 राइफलें और गोला बारूद बरामद किया। इस सिलसिले में एब्बोट उवाथाने सुमाना नाम के एक भिक्षु को गिरफ्तार किया गया। भिक्षु को फोंसेका का समर्थक माना जाता है।
पुलिस महानिरीक्षक महिंदा बालासूर्या ने फर्जी मतदान और धांधलियों की आशंका जाहिर की है। उन्होंने बताया, "हमें पता चला है कि संगठित गुट मतदाताओं के पहचान पत्र एकत्र कर रहे हैं ताकि उनकी नकल तैयार करवाकर मतदान किया जा सके।"
एक अन्य घटना में देश के उत्तरी हिस्से में फोंसेका के खिलाफ पोस्टर ले जा रहे एक नौसेना के एक ट्रक को पकड़ा गया है। चुनावी हिंसा से जुड़ी 850 घटनाओं में चार मौतें हुई हैं, राजनीतिक पार्टियों के कार्यालयों पर हमले हुए हैं, मतदाताओं को धमकाया गया है तथा गोलीबारी की वारदातें हुई हैं।
लिट्टे के खात्मे के बाद पहली बार होगा चुनाव :
तमिल विद्रोही संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के खात्मे के बाद पहली बार श्रीलंका में मंगलवार को राष्ट्रपति पद के लिए मतदान होगा।
तमिल चीतों को कुचलने में साथ रहे दो व्यक्तियों राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे और पूर्व सेना प्रमुख सरथ फोंसेका के बीच राष्ट्रपति पद पर कब्जा करने के लिए पूरे श्रीलंका में कड़ी लड़ाई देखी जा रही है।
यद्यपि चुनाव में 20 अन्य उम्मीदवार भी हैं लेकिन मुख्य मुकाबला राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे और पूर्व सेना प्रमुख सरथ फोंसेका के बीच है। लिट्टे के दमन से पहले राजपक्षे और फोंसेका मित्र थे। दोनों ही सिंहली समुदाय से हैं।
बहुत अधिक समय नहीं गुजरा जब नवंबर 2005 में राष्ट्रपति बनने वाले राजपक्षे ने लिट्टे को समाप्त करने का संकल्प लिया था। लिट्टे के अप्रैल 2006 में किए गए हमले में बाल-बाल बचने वाले फोंसेका भी दुनिया में सबसे अधिक समय से जारी आतंकवाद को खत्म करने में उनके साथ खड़े थे।
पिछले वर्ष मई में लिट्टे को हराने और उसके नेतृत्व के खात्मे के बाद राजपक्षे और फोंसेका को श्रीलंका में भगवान जैसा माने जाने लगा। भले ही जीत की अत्यधिक मानवीय कीमत चुकानी पड़ी लेकिन बहुसंख्यक सिंहली समुदाय ने उनको नायकों का दर्जा दिया। इसके तुरंत बाद राजपक्षे और फोंसेका की मित्रता समाप्त हो गई।
राजपक्षे के खेमे का कहना है कि फोंसेका अपनी सीमा से बाहर जा रहे थे और लिट्टे के खिलाफ जीत का वास्तविक श्रेय राष्ट्रपति को जाना चाहिए जिन्होंने पश्चिमी दबाव के आगे घुटने नहीं टेके। फोंसेका पर एक सैन्य विद्रोह के प्रयास का भी आरोप लगाया गया।
जनरल ने पलटवार करते हुए कहा कि युद्ध के बाद राजपक्षे ने उनको अलग-थलग करने का प्रयास किया। उन्होंने नवंबर में सेना छोड़ी और विपक्षी पार्टियों के गठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर राष्ट्रपति के चुनाव में उम्मीदवार बन गए।
चुनाव में अहम रहेगी तमिलों की भूमिका :
श्रीलंका में हो रहे राष्ट्रपति चुनाव में तमिल अल्पसंख्यकों की भूमिका निर्णायक साबित हो सकती है क्योंकि बहुसंख्यक सिंहली वोट दोनों प्रमुख उम्मीदवारों राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे और सेवानिवृत्त सेना प्रमुख सरथ फोंसेका में बंटता दिख रहा है।
समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक श्रीलंका की दो करोड़ आबादी में 70 फीसदी सिंहली हैं जबकि तमिलों की आबादी महज 18 फीसदी है। सिंहली वोटों के बंटने के चलते अल्पसंख्यक होते हुए भी तमिल महत्वपूर्ण भूमिका में हैं।
वर्तमान राष्ट्रपति राजपक्षे की सिंहलियों पर पकड़ है। वह अपने चुनाव प्रचार के दौरान कह रहे हैं कि अगले हफ्ते होने वाला चुनाव उनके छह वर्षीय कार्यकाल की समाप्ति को दो वर्ष आगे तक ले जाएगा। बहरहाल, राजपक्षे और फोंसेका दोनों ही देश से लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) का सफाया करने का श्रेय ले रहे हैं। राजपक्षे ने हालांकि इसका नेतृत्व किया था।
तमिल राष्ट्रीय गठबंधन (टीएनए) ने इस बीच फोंसेका का समर्थन किया है। वह पहली बार राजनीतिक भविष्य आजमा रहे हैं। जाफना के तमिल व्यवसायी सिवसोथी कनगराजा ने कहा, "लिट्टे के खिलाफ जनरल फोंसेका ने सैन्य अभियान चलाया था लेकिन राजपक्षे ने इस युद्ध का फैसला किया था।"
सिंहली बहुल क्षेत्रों में लिट्टे के खिलाफ युद्ध को सकारात्मक रूप में देखा गया। सिंहलियों के एक वर्ग का मानना है कि लिट्टे के खात्मे में जनरल फोंसेका की भूमिका महत्वपूर्ण थी जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि इसमें राजपक्षे की भूमिका अहम थी।
गॉल के 47 वर्षीय एक किसान ने कहा, "राजपक्षे की खातिर ही देश आतंकवादियों के चंगुल से मुक्त हुआ, नहीं तो वे अलग देश बनाने पर ही आमादा था।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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