पूर्ण स्वराज : जवाहर लाल नेहरू (गणतंत्र दिवस पर विशेष-7)
नई दिल्ली, 23 जनवरी (आईएएनएस)। आईएएनएस की चुनिंदा भाषणों की श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज पेश है जवाहर लाल नेहरू का भाषण। सन् 1929 में लाहौर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू पार्टी के अध्यक्ष थे। कांग्रेस के जुलूस में एक सफेद घोड़े पर सवार वे नियति द्वारा चुने गए-जैसी कि महात्मा गांधी ने भविष्यवाणी की थी- क्रांति के एक युवा तुर्क लगते थे।
पूर्ण स्वराज की मांग करते हुए उनके इस अध्यक्षीय भाषण ने देश के अवज्ञा और विद्रोह से भरे मूड को ठीक से अभिव्यक्त किया। पूर्ण स्वराज की मांग कुछ समय से हवा में थी। कांग्रेस के पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव ने उसे मूर्त रूप दिया और नेहरू के अध्यक्षीय भाषण ने उसे एक औपचारिक स्वरूप प्रदान किया। नेहरू ने भारत के स्वाधीनता संघर्ष को 'शक्ति की विजय' बताया और उसे घटते यूरोपीय प्रभुत्व के अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में रखा।
भाषण का हर तरफ उत्साह से स्वागत हुआ, सिवाय ब्रिटिश क्षेत्रों के, जो इस बात से खिन्न थे कि कांग्रेस ने एक समाजवादी और क्रांतिकारी को गद्दी पर बिठा दिया था। जब तिरंगा फहराया गया तो लाहौर कांग्रेस का मूड उपयुक्त रूप से व्यक्त हुआ, जब परंपरागत 'वंदे मातरम्' के नारे के साथ 'इनकलाब जिंदाबाद' का नारा भी गूंज उठा। आदर्शवादी राष्ट्रवादी नेहरू किसी राजनीतिक समझौते के मूड में नहीं थे। यह उनका आखिरी रूमानी भाषण था। पेश है जवाहर लाल नेहरू का भाषण-
साथियो, पिछले चौवालीस वर्षो से इस राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया है। इस अवधि में उसने धीरे-धीरे, लेकिन निश्चित रूप से राष्ट्रीय चेतना को एक लंबे समय से चली आ रही जड़ता से निकालकर जाग्रत कर दिया और एक राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा कर दिया। यदि हम अपनी नियति के संकटकाल में, अपनी शक्तियों और कमजोरियों के एहसास के साथ आशा व आशंका से भविष्य की ओर देखते हुए आज एकत्र हुए हैं तो यह उचित है कि सबसे पहले हम उन्हें याद करें, जो आज हमारे बीच नहीं हैं और जिन्होंने बिना किसी प्रतिफल की आशा किए, अपना सारा जीवन देश की सेवा में अर्पित कर दिया, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपने जीवन में उपलब्धियों का सुख हासिल कर सकें।
भूतकाल के कई दिग्गज हमारे बीच नहीं हैं और आज के हम लोग, जो उनकी बनाई जमीन पर खड़े हैं, अकसर उनके प्रयासों का अवमूल्यन करते हैं। यही दुनिया का चलन है। परंतु आप में से कोई भी एक स्वतंत्र भारत की बुनियाद रखने में उनके द्वारा किए गए महान् कार्यो के लिए उन्हें नहीं भूल सकता। और हम में से कोई भी स्त्रियों व पुरूषों के उस शानदार समूह को कभी नहीं भूल सकता, जिन्होंने नतीजों की परवाह किए बिना एक विदेशी प्रभुत्व के प्रति विरोध प्रकट करते हुए अपना युवा जीवन होम कर दिया या उसे तकलीफों और यातनाओं से गुजारा।
उनमें से कई लोगों के नाम तक हमें मालूम नहीं हैं। सार्वजनिक प्रशंसा की अपेक्षा किए बिना उन्होंने संघर्ष किया, यातनाएं सहीं और अपने हृदय के खून से भारत की स्वतंत्रता के नाजुक पौध को सींचा। जहां हम में से कई ने टालमटोल की और समझौते किए, उन्होंने खड़े होकर जनता के स्वतंत्रता के अधिकार की घोषणा की और दुनिया को दिखा दिया कि अपनी अधोगति में भी भारत के प्राणों की चिनगारी है, उसने अत्याचार और दासता के आगे समर्पण करने से इनकार कर दिया है।
एक-एक ईंट रखकर हमने अपने राष्ट्रीय आंदोलन को खड़ा किया है और अकसर अपने शहीद पुत्रों के शवों पर से भारत अग्रसर हुआ है। पूर्वकाल के दिग्गज भले ही हमारे बीच न हों, परंतु उनका साहस अब भी हमारे साथ है और भारत अब भी जतिनदास एवं विजाया जैसे शहीद पैदा कर सकता है।
यही वह शानदार विरासत है, जो हमें पूर्वजों से मिली है और आप मुझे जिसका प्रभारी बनाना चाहते हैं। मैं यह अच्छी तरह जानता हूं कि आपकी सुविचारित योजना से अधिक संयोग से मैं इस प्रतिष्ठत पद पर हूं। आपकी इच्छा एक और हस्ती को चुनने की थी- हमारे वर्तमान जगत् में जो सर्वश्रेष्ठ हैं- और उससे बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता था। परंतु भाग्य और उनकी दुर्गम संधि ने आपकी और मेरी इच्छा के खिलाफ जिम्मेदारियों के इस सागर में मुझे धकेल दिया। मुझे इस धर्म-संकट में डालने के लिए क्या मैं आपको आभार व्यक्त करू? परंतु उस व्यक्ति में अपना विश्वास व्यक्त करने के लिए मैं आपका आभारी हूं, जिसमें स्वयं विश्वास की कमी है।
आप उन अत्यावश्यक राष्ट्रीय समस्याओं पर चर्चा करेंगे, जो हमारे सामने खड़ी हैं और आपके फैसले भारत के इतिहास की दिशा को बदल सकते हैं। परंतु आप अकेले ऐसे लोग नहीं हैं, जो समस्याओं का सामना कर रहे हैं। पूरा विश्व ही आज एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है तथा प्रत्येक देश और वहां की जनता खलबली के दौर में है। विश्वास का युग और उसके साथ आने वाला चैन एवं स्थायित्व अब बीत चुका है और हर क्षेत्र में, चाहे वे हमारे पूर्वजों को कितने ही पवित्र और स्थायी लगते रहे हों, सवाल उठाए जा रहे हैं। हर तरफ संशय और बेचैनी है तथा राज्य और समाज के आधार रूपांतरण की प्रक्रिया में हैं।
स्वतंत्रता, न्याय, संपत्ति एवं परिवार तक से संबंधित पुराने विचारों पर हमला किया जा रहा है और इसका परिणाम अभी अधर में है। हम इतिहास के एक तरल पर्वितनशील दौर में हैं, जिसमें विश्व एक प्रसव-पीड़ा में है और उसी पीड़ा में से एक नई व्यवस्था का जन्म होगा।
यह कोई नहीं कह सकता कि भविष्य क्या लेकर आएगा, परंतु कुछ विश्वास के साथ हम इतना कह सकते हैं कि विश्व की भावी नीतियों में एशिया और भारत भी एक निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। यूरोपीय प्रभुत्व की संक्षिप्त अवधि पहले ही समाप्ति की ओर अग्रसर है। यूरोप अब हलचलों और दिलचस्पियों का केंद्र नहीं रह गया है। भविष्य अब अमेरिका और एशिया के हाथों में है। झूठा और अपूर्ण इतिहास पढ़कर हममें से कई यह सोचने लगे हैं कि शेष विश्व पर हमेशा यूरोप का प्रभुत्व रहा है और यूरोप की सेनाएं हमेशा एशिया को रौंदती रही हैं। हम भूल गए हैं कि हजारों वर्षो से एशियाई सेनाओं ने ही यूरोप को रौंदा है और स्वयं आधुनिक यूरोप में इन हमलावरों के वंशज अब भी बड़ी संख्या में रहते हैं। हम भूल गए हैं कि वह भारत ही था, जिसने सिकंदर की सैन्य-शक्ति को अंतत: निस्तेज कर दिया था।
विचार-निस्संदेह एशिया, विशेष रूप से भारत के गौरव रहे हैं, परंतु सैन्य कार्यवाहियों में भी एशिया का रिकॉर्ड उत्तम रहा है। परंतु हममें से कोई नहीं चाहता कि एशिया या यूरोप की सेनाएं एक-दूसरे के महाद्वीपों पर हमला करें। हम सब उन्हें बहुत झेल चुके हैं।
आज भारत एक वैश्विक आंदोलन का एक भाग है। न केवल चीन, तुर्की, पर्शिया और मिस्र बल्कि रूप व पश्चिम के देश भी इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं और भारत उनसे अलग-थलग नहीं रह सकता। हमारी अपनी समस्याएं हैं- कठिन और जटिल : हम उनसे भागकर विश्व को प्रभावित करने वाली व्यापक समस्याओं में स्वयं को छिपा लें। परंतु यदि हम दुनिया की अनदेखी करें तो हमारा ही अहित होगा। आज सभ्यता का जो स्वरूप है, वह किसी एक जाति या राष्ट्र की देन या एकाधिकार नहीं है। वह एक मिला-जुला ताना-बाना है, जिसमें सभी देशों का योगदान है और जिसे उन्होंने अपनी आवश्यकतानुसार अपना लिया है। यदि भारत के पास विश्व को देने के लिए कोई संदेश है और मुझे आशा है कि ऐसा है, तो उसे भी दूसरे देशों से ग्रहण करने तथा सीखने के लिए बहुत कुछ है।
जब सब कुछ बदल रहा है तो भारत के लंबे इतिहास को याद करना बेहतर होगा। इतिहास में बहुत कम चीजें भारत के सामाजिक ढांचे के अद्भुत स्थायित्व जितनी विस्मयकारी होंगी, जो बहुत से विदेशी प्रभावों तथा हजारों वर्षो के परिवर्तनों और संघर्षो के बावजूद कायम रहा। ऐसा इसलिए हुआ कि उसने हमेशा उन्हें सहन करने और आत्मसात् करने का प्रयास किया। उसका उद्देश्य उन्हें समाप्त करना नहीं, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों में सामंजस्य स्थापित करना था।
आर्य और आर्येतर लोग अपनी अपनी संस्कृतियों की पहचान बनाए रखने के अधिकार के साथ एक साथ रहे और बाहरी लोगों, जैसे पारसियों को भी सम्मान और सामाजिक ढांचे में एक स्थान मिला। मुसलमानों के आगमन से यह संतुलन डगमगा गया, परंतु भारत ने उसे पुर्नसतुलित करने का प्रयास किया और बहुत हद तक इसमें सफल भी रहा। दुर्भाग्यवश, अपनी भिन्नताओं में सामंजस्य बिठाने से पहले ही हमारा राजनीतिक ढांचा ध्वस्त हो गया, अंग्रेज आए और हम परास्त हुए।
एक स्थिर सामाजिक संरचना, जहां भारत की एक महान सफलता थी, एक महत्वपूर्ण क्षेत्र में वह असफल रहा और इसी असफलता से उसका पतन हुआ तथा अब भी वह इसी दुर्दशा में है। भारत में सामाजिक असमानता की समस्या का कोई हल न निकला। भारत ने जान-बूझकर उसकी उपेक्षा की और असमानता के आधार पर अपना सामाजिक ढांचा खड़ा किया। इस नीति के दु:खद परिणाम उन करोड़ों अभागे लोगों के रूप में सामने आए, जो अभी कल तक दबे हुए थे और जिनके पास विकास के अवसर लगभग शून्य थे।
और फिर भी, जब यूरोप ने अपने धर्मयुद्ध लड़े और अपने मुक्तिदाता के नाम पर जब ईसाइयों ने एक-दूसरे का खून बहाया, भारत सहिष्णु बना रहा। यद्यपि वह सहिष्णुता अब बहुत कम हो गई है। किसी हद तक धार्मिक स्वतंत्रता हासिल करने के बाद यूरोप ने राजनीतिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक और कानूनी समानता हासिल करने का प्रयास किया। इन्हें भी पाने के बाद उसे लगता है कि आर्थिक स्वतंत्रता और समानता के बिना उपर्युक्त उपलब्धियों का अधिक महत्व नहीं है। और इसीलिए राजनीति का अब उतना महत्व नहीं रहा है तथा सामाजिक व आर्थिक समानता का प्रश्न सबसे अधिक महत्वपूर्ण बन गया है।
भारत को भी इस समस्या का हल खोजना होगा और जब तक वह ऐसा नहीं करता, उसके राजनीतिक व सामाजिक ढांचे में स्थायित्व नहीं आ सकता। यह जरूरी नहीं कि वह समाधान किसी अन्य देश का अनुकरण कर निकाला जाए। यदि उसे एक स्थायी प्रकृति का होना है तो यह जरूरी है कि वह देश की प्रतिभा, उसके अपने दर्शन और संस्कृति की उपज हो। और जब वह मिल जाएगा तो विभिन्न समुदायों के बीच दुर्भाग्यपूर्ण मतभेद, जो हमें आज और उतना ही परेशान करते हैं तथा आजादी की राह में बाधक हैं, स्वत: समाप्त हो जाएंगे।
वास्तव में, बहुत हद तक मतभेद कम हुए हैं, लेकिन एक-दूसरे के प्रति भय तथा अविश्वास एवं संशय अब भी बने हुए हैं और वैमनस्य के बीज बोते हैं। समस्या यह है कि भय एवं संशय को कैसे दूर किया जाए और मानसिक होने के कारण ऐसा कर पाना दु:साध्य है। पिछले वर्ष सर्वदलीय समिति द्वारा ईमानदारी से ऐसा करने का प्रयास किया गया और लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में काफी प्रगति हुई थी। परंतु हमें खेद के साथ यह स्वीकार करना होगा कि वह सफलता किए गए प्रयासों के अनुरूप नहीं थी।
हमारे कई मुसलिम और सिख मित्रों ने सुझाए गए समाधानों का कड़ा विरोध किया है तथा गणितीय अंकों एवं प्रतिशतों को लेकर उग्र भावनाएं पैदा की हैं। भय और अविश्वास से लड़ने के लिए तर्क व समझदारी प्रभावी हथियार नहीं हैं। केवल विश्वास और उदारता उन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। मैं केवल आशा कर सकता हूं कि विभिन्न समुदायों के नेताओं के पास यह विश्वास और उदारता प्रचुर मात्रा में होंगे। हम अपने समुदाय के लिए क्या हासिल कर पाएंगे, यदि हम सब एक गुलाम देश के गुलाम नागरिक बने रहे, और यदि एक बार हमने भारत माता की जंजीरों को तोड़ दिया तथा फिर से आजादी की हवा में सांस ली तो हमारा नुकसान क्या होगा?
क्या हम चाहते हैं कि बाहरी लोग, जिन्होंने हमें गुलाम बनाए रखा है, हमारे संकुचित अधिकारों के रक्षक बनें, जबकि वे हमें स्वतंत्रता का प्राथमिक अधिकार भी देना नहीं चाहते? कोई बहुसंख्यक वर्ग एक संकल्पवान् अल्पसंख्यक वर्ग को कुचल नहीं सकता और विधायिका में कुछ सीटें बढ़ाकर किसी अल्पसंख्यक वर्ग को बचाया नहीं जा सकता। हमें यह याद रखना चाहिए कि आज की दुनिया में लगभग हर कहीं एक बहुत छोटा अल्पसंख्यक वर्ग सारी संपत्ति एवं राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में रखता है और विशाल बहुमत पर अपना प्रभुत्व बनाए रखता है।
मेरे मन में धार्मिक कट्टरता एवं मताग्रह के लिए कोई आकर्षण नहीं है और मुझे खुशी है कि वे कमजोर हो रहे हैं। न ही मुझे किसी भी रूप या आकार में सांप्रदायिकता पसंद है। मुझे यह समझने में कठिनाई होती है कि राजनीतिक या आर्थिक अधिकार किसी व्यक्ति के किसी धार्मिक समूह या समुदाय का सदस्य होने पर क्यों निर्भर होने चाहिए? अपने धर्म व संस्कृति के अनुसार जीवन-पद्धति अपनाने के अधिकार को मैं अच्छी तरह समझ सकता हूं और विशेष रूप से भारत, जिसने हमेशा इस अधिकार को माना और प्रदान किया है, उसे जारी रखने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। उस भय और विश्वास, जो हमारे मानसिक क्षितिज को धूमिल कर देता है, को समाप्त करने का कोई उपाय हमें खोजना होगा। एक गुलाम कौम की राजनीति बहुत हद तक डर एवं नफरत पर आधारित होती है और हम इतने लंबे समय से पराधीनता में रहे हैं, उनसे छुटकारा पाना इतना आसान नहीं है।
जन्म से मैं एक हिंदू हूं, परंतु मुझे नहीं मालूम कि स्वयं को हिंदू कहना और हिंदुओं की ओर से बोलना मेरे लिए कितना उचित है। परंतु इस देश में जन्म फिर भी मायने रखता है और जन्म के उस अधिकार से मैं हिंदुओं के नेताओं से निवेदन करना चाहूंगा कि आगे बढ़कर उदारता दिखाने में भी उनका हित है। उदारता एक उच्च नैतिक गुण ही नहीं, बल्कि अकसर वह उत्तम राजनीति और कार्यसाधक उपाय सिद्ध होता है। और मेरे लिए यह कल्पनातीत है कि एक आजाद भारत में हिंदू कभी भी भक्तिहीन हो सकते हैं। जहां तक मेरा संबंध है, मैं अपने मुसलिम और सिख दोस्तों से कहूंगा कि वे जो कुछ चाहते हैं, वह बिना आंदोलन एवं बहस किए मुझसे ले सकते हैं। मैं जानता हूं कि जल्द ही वह समय आ रहा है, जब लेबलों व नामों का कोई महत्व नहीं होगा और हमारे संघर्ष आर्थिक आधारों पर होंगे। तब तक, इस बात का इतना महत्व नहीं है कि हमारी आपसी व्यवस्थाएं क्या हैं, बशर्ते वे हमारी भावी प्रगति में रोड़ा न बनें।
अब सचमुच वह समय आ गया है, जब सर्वदलीय रिपोर्ट को एक तरफ रखकर हमें निर्बाध रूप से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए। आपको याद होगा कि उस सर्वदलीय योजना की स्वीकृति के लिए पिछली कांग्रेस के प्रस्ताव में एक वर्ष की अनुग्रह अवधि निर्धारित की गई थी। यह वर्ष लगभग पूरा हो चुका है और इस कांग्रेस के लिए उस निर्णय का सहज मुद्दा यह है कि स्वराज के पक्ष में घोषणा कर दी जाए और उसे प्राप्त करने के लिए उपाय सुझाए जाएं।
हाल ही में एक शांति प्रस्ताव आया है। ब्रिटिश सरकार की ओर से वायसराय ने कहा है कि भारत के भावी संविधान पर ब्रिटिश सरकार से चर्चा करने के लिए भारतीय नेताओं को आमंत्रित किया जाएगा। वायसराय की मनशा नेक थी और उनकी भाषा शांति की भाषा। परंतु एक वायसराय की सद्भावना तथा शिष्ट मुहावरे, हमारे सामने खड़ी कठोर सच्चाइयों का सही विकल्प नहीं है। ब्रिटिश राजनय के कुटिल तरीकों को, हमें इतना अनुभव तो है कि हम उससे सावधान रहें। ब्रिटिश सरकार ने जो प्रस्ताव किया, वह अस्पष्ट था और उसमें किसी कार्यवाही के प्रति वचनबद्धता या वादा नहीं था। कल्पना को बहुत खींचकर ही उसे कलकत्ता-प्रस्ताव की संभावित प्रतिक्रिया माना जा सकता है। उसके तुरंत बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के कई नेता मिले और उस पर विचार किया। उन्होंने उसकी उदारतम व्याख्या की, क्योंकि वे शांति चाहते थे और उसके लिए आधे रास्ते चलकर जाने के लिए तैयार थे। परंतु विनम्र भाषा में उन्होंने उसे स्वीकार किए जाने की मुख्य शर्तो के बारे में भी बता दिया।
हममें से कई, जो स्वराज में विश्वास रखते हैं, जानते थे कि यह प्रस्ताव केवल हमें भटकाने और हमारी सेनाओं में फूट डालने के लिए है, अति व्यथित हुए और हमारे मन संशय से भर गए। यदि एक गौरवपूर्ण शांति का लेशमात्र भी अवसर था तो हमारे लिए क्या यह उचित था कि एक तूफानी राष्ट्रीय आंदोलन छेड़ने की जल्दी मचाते, जिसमें कई लोगों को अपार कष्ट झेलने पड़ते? अपने हृदय को बहुत टटोलते हुए हमने उस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और आज मैं नहीं जानता कि हमने सही किया या गलत? बाद में ब्रिटिश संसद् और अन्य स्थानों से व्याख्याएं एवं विस्तारण आए और उस प्रस्ताव के वास्तविक उद्देश्यों के बारे में सारा संदेह, यदि कोई संदेह था, दूर हो गया। फिर भी, आपकी कार्यकारिणी ने बातचीत के दरवाजे खुले रखे और अंतिम निर्णय कांग्रेस पर छोड़ दिया।
पिछले कुछ दिनों में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस में इस विषय पर एक और चर्चा हुई। भारतीय मामलों के मंत्री ने ध्यान दिलाया कि पिछली कई सरकारों ने केवल शब्दों के द्वारा नहीं, बल्कि कृत्यों से भी भारत के प्रति सच्ची निष्ठा को साबित करने का प्रयास किया है। भारत के लिए कुछ करने की मि. वेजवुड बेन की इच्छा और भारत की जनता की सद्भावना अर्जित करने की उनकी उत्कंठा का हमें सम्मान करना चाहिए। परंतु संसद में दिया गया उनका भाषणा और अन्य भाषण हमें उससे आगे नहीं ले जाते। स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा, जिसकी ओर उन्होंने ध्यान दिलाया है, हमारे लिए एक फंदा रहा है और निश्चित रूप से उससे भारत का शोषणा कम नहीं हुआ है।
इस 'डोमिनियन स्टेट्स इन ऐक्शन' और दस वर्ष पूर्व के तथाकथित संवैधानिक सुधारों से भारत की जनता पर बोझ और बढ़ा है। लंदन में उच्चायुक्त, लीग ऑफ नेशंस में प्रतिनिधि, सामग्री की खरीदी, भारतीय गवर्नर और उच्च अधिकारी- इनमें से कोई भी हमारी मांगों का हिस्सा नहीं है। हम भारत के गरीबों के शोषणा का अंत तथा केवल कुछ पदों की प्रतिष्ठा नहीं बल्कि वास्तविक सत्ता चाहते हैं। मि. वेजवुड बेन ने पिछले दशक की उपलब्धियों का ब्योरा दिया है। वे इनमें पंजाब में मार्शल लॉ, जालियांवाला बाग की गोलीबारी तथा 'वास्तविक स्वतंत्र उपनिवेश के दर्जे' की अवधि में जो दमन व शोषण लगातार चलता रहा- ये सब भी जोड़ सकते थे। उन्होंने इस पर भी प्रकाश डाला है कि एक अतिरिक्त स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा हमें और क्या-क्या दे सकता है। उसका अर्थ होगा- कुछ एक भारतीयों को सत्ता का आभास देकर जनसाधारण का और अधिक दमन व शोषणा करना।
यह अधिवेशन क्या करेगा? हमारे सहयोग की शर्ते अब तक पूरी नहीं हुई है। जब तक यह गारंटी नहीं मिल जाती कि हमें सच्ची स्वतंत्रता मिलेगा, क्या हम सहयोग कर सकते हैं? जब हमारे साथी जेल में हैं और दमन जारी है तो क्या हम सहयोग कर सकते हैं? क्या हम सहयोग कर सकते हैं, जब तक कि हमें भरोसा न दिलाया जाए कि वे लोग हम पर कोई रणनीतिक लाभ नहीं बल्कि सच्ची शांति चाहते हैं। संगीन की नोक पर शांति नहीं आ सकती और यदि हमें एक विदेशी कौम के अधीन रहना ही है तो कम-से-कम हम उससे सहमत एक पक्ष तो न बनें।
यदि कलकत्ता-प्रस्ताव बना रहता है तो आज हमारे सामने एक ही लक्ष्य है, अ-निर्भरता। आज के विश्व में 'अ-निर्भरता' एक प्रिय शब्द नहीं है, क्योंकि उसका अर्थ है-अनन्यता और अलगाव। सभ्यता ने संकुचित राष्ट्रवाद बहुत देख लिया और अब वह व्यापक सहयोग व परस्पर-निर्भरता की आकांक्षी है। और यदि हम 'अ-निर्भरता' शब्द का उपयोग करते हैं तो वह वृहद्तर आदर्श के विरोध में नहीं हैं। हमारे लिए अ-निर्भरता का अर्थ है-ब्रिटिश प्रभुत्व और ब्रिटिश साम्राज्यवाद से संपूर्ण स्वतंत्रता। स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद मुझे कोई संदेह नहीं है कि भारत न केवल वैश्विक सहयोग और संघ-शासन के सभी प्रयासों का स्वागत करेगा, बल्कि एक वृहद्तर समूह, जिसका वह स्वयं बराबरी का एक सदस्य है, की भलाई के लिए वह स्वयं अपनी स्वतंत्रता का एक भाग त्यागने के लिए तैयार रहेगा।
ब्रिटिश साम्राज्य आज एक ऐसा समूह नहीं है और जब तक वह करोड़ों लोगों पर आधिपत्य जमाए हुए और वहां के निवासियों की मरजी के खिलाफ दुनिया का एक बड़ा भूभाग अपने कब्जे में किए हो, वह हो भी नहीं सकता। जब तक साम्राज्यवाद उसका आधार और अन्य कौमों का शोषण उसके संपोषण का मुख्य जरिया है, वह एक सच्चे राष्ट्र संघ (का सदस्य) नहीं बन सकता। ब्रिटिश साम्राज्य असल में धीरे-धीरे अपने राजनीतिक विघटन की प्रक्रिया से गुजर रहा है। उसका संतुलन गड़बड़ा गया है।
दक्षिण अफ्रीका संघ उसके परिवार का एक संतुष्ट सदस्य नहीं है और न आयरिश फ्री स्टेट स्वेच्छा से उसके साथ। मिस्र हाथ से निकला जा रहा है। भारत कभी भी राष्ट्र संघ का एक बराबरी का सदस्य नहीं बन सकता, जब तक कि साम्राज्यवाद और उसके संघ का एक बराबरी का सदस्य नहीं बन सकता, जब तक कि साम्राज्यवाद और उसके साथ जो कुछ भी आता है, का अंत न हो जाए। जब तक ऐसा नहीं होता, साम्राज्य में भारत की स्थिति पराधीनता की ही रहेगी और उसका शोषण जारी रहेगा।
विश्व शांति की बातें हो रही हैं और दुनिया द्वारा शांति समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। उन समझौतों के बावजूद हथियारों की मात्रा बढ़ रही है और सुंदर भाषा ही वह एकमात्र श्रद्धांजलि है, जो शांति की देवी को अर्पित की जाती है। शांति तभी आ सकती है, जब युद्ध के कारणों को दूर कर दिया जाए। जब तक एक देश पर दूसरे का आधिपत्य बना रहता है या एक वर्ग द्वारा दूसरे का शोषण होता रहता है, वर्तमान व्यवस्था का अंत करने के लिए हमेशा प्रयास होते रहेंगे और कोई स्थायी संतुलन न लाया जा सकेगा।
साम्राज्यवाद और पूंजीवाद की कोख से कभी शांति का जन्म नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्य इन्हीं का समर्थक है और जनता के शोषण पर आधारित है। हम स्वयं के लिए उसमें कोई स्थान नहीं पाते। हमें जो भी लाभ मिल सकता है, उसका कोई मूल्य नहीं है, जब तक वह जनता पर लादे गए असहनीय बोझ को कम न करे। एक बड़े साम्राज्य का वजन बहुत ज्यादा होता है और जिसे हमारी जनता ने लंबे समय से ढोया है। उनकी कमर झुक गई है और हौसला लगभग टूट चुका है। यदि उन पर शोषण का भार बना रहा तो वे राष्ट्र संघ में भागीदारी कैसे कर पाएंगे? जिन समस्याओं का सामना हमें करना पड़ रहा है, उनमें से कई उन निहित स्वार्थो की हैं, जिन्हें अधिकांश: ब्रिटिश सरकार ने पैदा या प्रोत्साहित किया है।
भारतीय रियासतों के शासकों, ब्रिटिश अधिकारियों, ब्रिटिश पूंजी और भारतीय पूंजी एवं बड़े जमींदारों के स्वार्थ हम पर थोप दिए गए हैं और वे संरक्षण के लिए हमेशा शोर मचाते रहते हैं। करोड़ों अभागे गरीबों, जिन्हें सचमुच संरक्षण की जरूरत है, की लगभग कोई आवाज नहीं है और न कोई समर्थन।
स्वतंत्रता और 'स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा' को लेकर काफी विवाद रहा है तथा इन शब्दों को लेकर हममें कटुता रही है। परंतु वास्तविक चीज है सत्ता प्राप्त करना, चाहे उसका नाम कुछ भी हो। मैं नहीं समझता कि स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा, जिसे किसी भी स्वरूप में भारत पर लागू किया जाए, हमें वास्तविक सत्ता प्रदान करेगा। इस सत्ता की एक कसौटी होगी- आधिपत्य की विदेशी सेना की पूर्णत: वापसी और आर्थिक नियंत्रणों का हटाया जाना। इसलिए हम इन बातों पर अपने प्रयास केंद्रित करें, अन्य बातें स्वत: उनका अनुसरण करेंगी।
इसलिए, हम भारत की संपूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने के लिए यहां एकत्र हुए हैं। इस कांग्रेस ने किसी भी तरह से हम पर हुक्म चलाने के ब्रिटिश संसद के अधिकार को स्वीकार नहीं किया है और न करेगी। हम उससे कोई अनुरोध भी नहीं कर रहे हैं। परंतु हम विश्व की संसद् और उसकी अंतरात्मा से जरूर अपील करते हैं, और मुझे आशा है कि उन्हीं की हम घोषणा करेंगे कि भारत अब किसी विदेशी आधिपत्य को स्वीकार नहीं करेगा। आज या कल, वे इतने समर्थ नहीं रहेंगे कि हमारी आवाज को दबा सकें। हम अपनी कमजोरियों को अच्छी तरह जानते हैं। हमें अपनी ताकत का घमंड नहीं है और न हम बड़ी बात करते हैं। परंतु कोई भी, इंग्लैंड तो बिलकुल भी नहीं, हमारे संकल्प के अर्थ या उसकी शक्ति को कम न आंके। प्
ारिणामों को अच्छी तरह से जानते हुए हम गंभीरता से कहते हैं कि हम आजादी ले लेंगे और हमारे कदम कभी पीछे नहीं हटेंगे। जब एक महान् देश अपना मन बना लेता है और संकल्प कर लेता है तो उसे बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता। यदि हम आज असफल हो जाते हैं और कल भी सफल नहीं होते, तो परसों जरूर सफलता लेकर आएगा।
हम संघर्षो और भूख से तंग आ चुके हैं तथा शांति व रचनात्मक कार्यो का अवसर चाहते हैं। क्या हम अपने घरों का टूटना या हमारे बहादुर नौजवानों को जलते हुए फांसी पर चढ़ते देखना पसंद करते हैं? क्या एक मजबूत हड़ताल पर जाकर अपनी तुच्छ कमाई को गंवाकर भूखों मरना पसंद करता है? वह ऐसा मजबूरी में ही करता है, जब उसके सामने और कोई रास्ता नहीं बचता। और हम, जो राष्ट्रीय संघर्ष का संकटपूर्ण रास्ता अपनाते हैं, तो इसलिए कि एक गौरवपूर्ण शांति का और कोई रास्ता नहीं है। परंतु हम शांति के इच्छुक हैं और हमारा उन सबके लिए दोस्ती का हाथ हमेशा बढ़ा रहेगा, जो उसे थामना चाहें। परंतु उस हाथ के पीछे एक शरीर होगा, जो अन्याय के आगे नहीं झुकेगा और एक दिमाग होगा, जो किसी अहम मुद्दे पर समझौता नहीं करेगा।
उस लंबे संघर्ष को देखते हुए जो हमारे सामने है, हमारा भावी संविधान तय करने का समय अभी नहीं आया है। पिछले दो वर्षो या इससे अधिक समय में हमने संविधान के मसौदे बनाए हैं और अंत में सर्वदलीय समिति ने इन प्रयासों को बल देने के लिए एक योजना बनाई, जिसे कांग्रेस ने एक वर्ष के लिए स्वीकार कर लिया था। इस योजना को बनाने में जो श्रम लगा, वह व्यर्थ नहीं गया और भारत को उससे लाभ मिला है। परंतु एक वर्ष बीत चुका है और हमें परिस्थितियों का सामना करना है, जो संविधान बनाने से अधिक जमीनी कार्रवाई की मांग करते हैं। परंतु हम उन समस्याओं की अनदेखी नहीं कर सकते, जो हमें घेरे हुए हैं और जो हमारे संघर्ष की और भावी संविधान को बना या बिगाड़ सकती हैं।
सामाजिक सौहार्द और विघटनकारी तत्वों, जो भारत के लिए अभिशाप रहे हैं, का सफाया हमारा लक्ष्य होना चाहिए। मुझे स्पष्ट रूप से यह स्वीकार करना चाहिए कि मैं एक समाजवादी और गणतंत्रवादी हूं तथा राजाओं एवं युवराजों या उस व्यवस्था में विश्वास नहीं करता, जो उद्योगों के आधुनिक महाराजा जिनका लोगों के जीवन और तकदीर पर पुराने राजाओं से भी ज्यादा कड़ा शिकंजा है तथा जिनके तरीके पुराने सामंतों से भी अधिक शोषक हैं, पैदा करती है। परंतु मैं यह मानता हूं कि राष्ट्रीय कांग्रेस के अंतर्गत स्थापित की गई इकाई और देश की वर्तमान परिस्थितियों में एक संपूर्ण समाजवादी कार्यक्रम स्वीकार किया जाना संभव नहीं है।
परंतु हमें यह समझ लेना चाहिए कि समाजवादी दर्शन धीरे-धीरे पूरी दुनिया में समाज के पूरे ढांचे में अपनी पैठ बना चुका है तथा मतभेद केवल उसे प्राप्त करने की गति और तरीकों को लेकर हैं। यदि भारत को अपनी गरीबी और असमानता का अंत करना है तो उसे भी इसी राह पर चलना होगा। यद्यपि वह अपने तरीके स्वयं तय कर सकता है और अपनी कौम की प्रतिभा के अनुसार उस आदर्श को साकार कर सकता है।
हमारे सामने तीन प्रमुख समस्याएं हैं- अल्पसंख्यक वर्ग, भारतीय रियासतें तथा मजदूर और किसान वर्ग। अल्पसंख्यकों के बारे में मैं पहले ही बात कर चुका हूं। मैं केवल इतना दोहराना चाहूंगा कि हमें अपने शब्दों और कार्यो द्वारा उन्हें पूरा भरोसा दिलाना होगा कि उनकी संस्कृति और परंपराएं सुरक्षित रहेंगी।
भारतीय रियासतें शेष भारत से अलग नहीं रह सकतीं और उनके शासकों को, जब तक कि वे अपनी सीमाओं को स्वीकार नहीं करते, उन्हीं शासकों की राह पर जाना होगा, जो उन्हीं की तरह सोचते थे। और जिन लोगों को रियासतों के भविष्य का फैसला करने का अधिकार है, वे रियासतों के निवासी, जिनमें शासक भी शामिल हैं। यह कांग्रेस, जो स्वनिर्णय के अधिकार की मांग करती है, इन रियासतों के नागरिकों को उससे वंचित नहीं कर सकती। उसी बीच कांग्रेस उन शासकों के साथ बात करने के लिए सहर्ष सहमत है, जो ऐसा करना चाहते हैं, जिससे ऐसे उपाय खोजे जा सकें कि परिवर्तन झकझोर देने वाला न हो। परंतु किसी भी स्थिति में रियासतों के लोगों की उपेक्षा नहीं की जाएगी।
हमारी तीसरी प्रमुख समस्या इनमें सबसे बड़ी है, क्योंकि किसान और मजदूर ही भारत हैं और जिस हद तक हम उन्हें खुशहाल बना सकेंगे तथा उनकी जरूरतें पूरी कर सकेंगे, उतने ही हम अपने उद्देश्य में सफल होंगे। और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ति का अंदाजा उसमें उनके शामिल होने से लगेगा। उन्हें अपने साथ लेने का लाभ तभी मिलेगा, जब हम उनके हित, जो वास्तव में देश का हित है, की बात करेंगे। कांग्रेस ने अकसर उनके प्रति सद्भावना जताई है, परंतु वह उससे आगे नहीं गई है। यह कहा गया है कि कांग्रेस को पूंजी और श्रम तथा जमींदार और काश्तकार के बीच न्यायपूर्ण संतुलन बनाकर चलना चाहिए।
परंतु यह संतुलन बुरी तरह से एक ओर झुक रहा है और अब भी है तथा यथास्थित बनाए रखना अन्याय व शोषणा को बनाए रखने के बराबर है। उसे ठीक करने का एक ही उपाय है- एक वर्ग पर दूसरे के दबदबे को खत्म करना। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के इस आदर्श को कुछ महीने पहले बंबई में एक प्रस्ताव पास करके स्वीकार किया था। मुझे आशा है कि कांग्रेस इस पर अपनी मुहर लगा देगी और एक ऐसे कार्यक्रम की रूपरेखा बनाएगी, जिसके जरिए ये परिवर्तन तुरंत लागू किए जा सकें।
परंतु औद्योगिक श्रम भारत का एक छोटा सा हिस्सा है। यद्यपि वह तेजी से एक ऐसी ताकत बन रहा है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। वे कश्तकार और खेत मजदूर ही हैं, जो राहत के लिए जोर से तथा दयनीयता से पुकार करते हैं और हमारा कार्यक्रम उनके मौजूदा हालात को लक्ष्य करके बनाया जाना चाहिए। वास्तविक राहत भी भू-स्वामित्व कानूनों और काश्तकारों की वर्तमान व्यवस्था में भारी सुधारों से मिलेगी।
हमारे बीच कई बड़े जिम्मेदार बैठे हैं और हम उनका स्वागत करते हैं। परंतु हमें समझ लेना चाहिए कि व्यक्तिगत रूप से बड़ी जागीरों का स्वामित्व, जो यूरोप के पुराने सामंतवाद से मिलते-जुलते राज्य की देन है, एक ऐसी परंपरा है, जो सारी दुनिया से तेजी से गायब हो रही है। यहां तक कि उन देशों में भी, जो पूंजीवाद के गढ़ हैं, बड़ी अमीरों को टुकड़ों में बांटकर उन्हें काश्तकारों को खेती के लिए दे दिया जाता है। भारत में भी ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं, जहां स्वामित्वधारी कृषक की व्यवस्था का चलन है और हमें इसे सारे देश में लागू करना होगा। मुझे आशा है कि ऐसा करने से हमें कम-से-कम कुछ बड़े जमींदारों का सहयोग प्राप्त होगा।
इस कांग्रेस के लिए यह संभव नहीं है कि वह अपने वार्षिक अधिवेशन में एक विस्तृत आर्थिक कार्यक्रम बना सके। यह केवल कुछ सामान्य सिद्धांत निर्धारित कर सकती है और अखिल भारतीय कांग्रेस समिति से अनुरोध कर सकती है कि ट्रेड यूनियन कांग्रेस और अन्य संगठनों, जो इस विषय में गहरी रूचि रखते हों, के सहयोग से आवश्यक ब्योरे दर्ज कर ले। दरअसल, मुझे आशा है कि इस कांग्रेस एवं ट्रेड यूनियन कांग्रेस के बीच सहयोग बढ़ेगा और भावी संघर्षो में दोनों संगठन कंधे से कंधा मिलाकर लड़ेंगे।
ये सब पवित्र अपेक्षाएं हैं, जब तक हम सत्ता प्राप्त नहीं कर लेते और इसलिए हमारे सामने वास्तविक समस्या सत्ता प्राप्त करने की है। हम सूक्ष्म विवेचन, बहस और वकील-सुलभ बाल की खाल निकालने के जरिए ऐसा नहीं कर सकते, बल्कि राष्ट्र की मरजी उन पर थोपने के लिए व्यापक समर्थन जुटाकर ही ऐसा कर सकते हैं। उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उस कांग्रेस को विचार करना चाहिए।
पिछला वर्ष हमारे लिए तैयारियों का वर्ष रहा है और कांग्रेस संगठन को पुनर्गठित करने तथा उसे मजबूत बनाने के लिए हमने हर संभव प्रयास किया है। इसके नतीजे अच्छे रहे हैं और हमारा संगठन जितनी बेहतर स्थिति में आज है, उतना असहयोग आंदोलन की प्रतिक्रियाएं आरंभ होने के समय के बाद कभी नहीं रहा था। परंतु हमारी कई कमजोरियां भी हैं, जो स्पष्ट हैं। कांग्रेस समितियों तक में आपसी कलह दुर्भाग्यवश आम बात है तथा चुनावी तू-तू, मैं-मैं हमारी सारी शक्ति और ऊर्जा को जाया कर देती है। जब तक हम अपनी इस पुरानी कमजोरी से छुटकारा नहीं पा लेते और अपने खुद स्वार्थो से ऊपर नहीं उठते, हम कैसे कठिन संघर्षो से उतर सकते है? मैं गंभीरता से यह आशा करता हूं कि देश के सामने एक मजबूत क्रियाशील कार्यक्रम पेश करने से हमारा नजरिया उदार बनेगा और हम इस निष्फल एवं हौसला तोड़े देने वाला वैमनस्य को सहन नहीं करेंगे।
वह कार्यक्रम क्या हो सकता है? हमारे विकल्प सीमित हैं, हमारे संविधान के कारण नहीं, जिसे हम जब चाहे बदल सकते हैं, बल्कि तथ्यों और परिस्थितियों के कारण। हमारे संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है कि हमारे तरीके वैध और शांतिपूर्ण होने चाहिए। मुझे आशा है कि वे हमेशा ही वैध होंगे, क्योंकि अपने किसी भी कृत्य के द्वारा हम जिस महान उद्देश्य के लिए संघर्षरत हैं, उसे कलंकित व बदनाम नहीं करना चाहिए और जिस पर हमें स्वयं ही बाद में पछताना पड़े। मैं चाहूंगा कि वे शांतिपूर्ण हों, क्योंकि शांतिपूर्ण तरीके हिंसात्मक तरीकों से अधिक वांछनीय और दीर्घजीवी होते हैं। हिंसा अपने साथ अकसर प्रतिक्रिया एवं परिणाम स्वरूप हतोत्साह को लेकर आती है और विशेष रूप से हमारे देश में वह आंदोलन को ठप कर सकती है।
यह सर्वथा सत्य है कि दुनिया में संगठित हिंसा का बोलबाला है और यह संभव है कि उनके इस्तेमाल से हमें भी लाभ हो। परंतु संगठित हिंसा के लिए न तो हमारे पास भौतिक साधन हैं और न सैन्य प्रशिक्षण की सुविधाएं तथा व्यक्तिगत व छिटपुट हिंसा हताशा की स्वीकृति है। हममें से अधिकांश लोग, मैं यह मानकर चलता हूं कि, इस मुद्दे को नैतिक के बजाय व्यावहारिक तुला पर तौलते हैं और यदि हम हिंसा के मार्ग को अस्वीकार करते हैं तो इसलिए कि उससे समुचित परिणामों की आशा नहीं है। कोई भी स्वाधीनता आंदोलन आज आवश्यक रूप से जन-आधारित होना चाहिए और किसी भी जन-आंदोलन की प्रकृति शांतिपूर्ण होनी चाहिए, सिवाय संगठित विद्रोह के समय।
चाहे हम दस वर्ष पहले के असहयोग आंदोलन की बात करें या आधुनिक औद्योगिक हथियार, आम हड़ताल की, इनका आधार है शांतिपूर्ण संगठन और शांतिपूर्ण कार्रवाई। और यदि मुख्य आंदोलन शांतिपूर्ण हो तो यदा-कदा घटित होने वाली समकालीन हिंसक घटनाएं केवल उसे भद्दा और कमजोर कर सकती हैं। एक ही समय में दो आंदोलनों को साथ-साथ चलाना संभव नहीं है। हमें दोनों में से एक ही चुनना और अपने चुने हुए रास्ते से हटना नहीं चाहिए। इस कांग्रेस का चुनाव क्या होगा, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। वह केवल एक शांतिपूर्ण जन-आंदोलन को चुन सकती है।
क्या हमें असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम और उसकी रणनीति को दोहराना चाहिए? जरूरी नहीं है, परंतु बुनियादी विचार यही रहना चाहिए। कार्यक्रम और रणनीतियां उस समय की परिस्थितियों के अनुसार होनी चाहिए और इस कांग्रेस के लिए इस वक्त उन्हें ब्योरेवार तय करना न तो आसान है और न वांछनीय। यह उसकी कार्यकारिणी अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का कार्य होना चाहिए। परंतु आधारभूत सिद्धांत तय किए जाने चाहिए।
पुराना कार्यक्रम तीन बहिष्कारों पर आधारित था- कौंसिलें, अदालतें और स्कूल- जिसमें सेना में भरती होने और टैक्स देने से इनकार करना शामिल है। जब राष्ट्रीय आंदोलन अपने चरम उत्कर्ष पर हो तो मैं यह देख पाने में असमर्थ हूं कि उसमें शामिल कोई व्यक्ति अदालत या स्कूल में अपना काम कैसे जारी रख सकता है। परंतु फिर भी, मैं समझता हूं कि इस वक्त अदालतों और स्कूलों का बहिष्कार करना बुद्धिमानी की बात नहीं होगी।
विधान परिषदों के बहिष्कार को लेकर पूर्व में गरमागरम बहसें हुई हैं और इस मुद्दे पर कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी है। उस विवाद को फिर से उठाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आज परिस्थितियां बिलकुल अलग हैं। मैं समझता हूं कि कुछ वर्ष पहले कांग्रेस द्वारा परिषदों में कांग्रेसियों के प्रवेश की अनुमति देने का फैसला अपरिहार्य था और मैं यह कहने के लिए तैयार नहीं हूं कि उसका कुछ भी लाभ नहीं हुआ है। परंतु वह लाभ अब समाप्त हो चुका है तथा बहिष्कार और असहयोग के बीच कोई रास्ता अब नहीं बचा है।
इन छद्म विधायिकाओं द्वारा हमारे कार्यकर्ताओं के मन में जो निराशा पैदा हो गई और हमारे कितने मेधावी सदस्यों, उनकी समितियों एवं आयोगों को जिस तरह निष्प्रभावी बनाया गया, यह हम सब जानते हैं। हमारे कार्यकर्ताओं की संख्या सीमित है और जब तक वे हमारी विधायिकाओं के महलनुमा सदनों में मुंह-मोड़कर अपना ध्यान आंदोलनों पर केंद्रित नहीं करते, हमारे आंदोलन सफल नहीं होंगे। और यदि हम आजादी की घोषणा करते हैं तो परिषदों में प्रवेश करके कैसे वहां की नीरस और लाभहीन गतिविधियों को चलाते रहेंगे?
किसी कार्यक्रम या नीति को सदा के लिए निर्धारित नहीं किया जा सकता और यह कांग्रेस देश को स्वयं को भी अनिश्चितकाल के लिए एक ही कार्ययोजना से नहीं बांध सकती। परंतु आज मैं कांग्रेस से आदरपूर्वक निवेदन करूंगा कि परिषदों के संबंध में हमारी एक ही नीति है- उनका पूर्णत: बहिष्कार। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने पिछली जुलाई को यह सिफारिश की थी, और अब समय आ गया है कि उसे लागू किया जाए।
यह बहिष्कार केवल एक लक्ष्य-प्राप्ति का साधन होगा। यह ऊर्जा को मुक्त करेगा और वास्तविक संघर्ष की ओर ध्यान आकर्षित करेगा। जो टैक्स का भुगतान न करने और जहां संभव हो, मजदूर संगठनों के सहयोग से हड़ताल के रूप में होना चाहिए। परंतु करों की गैर-अदायगी कुछ निश्चित क्षेत्रों में सुसंगठित रूप से होनी चाहिए और इस प्रयोजन के लिए कांग्रेस द्वारा अखिल भारतीय कांग्रेस समिति को जहां वह उचित समझे, आवश्यक कार्रवाई करने के लिए अधिकृत किया जाना चाहिए।
मैंने कांग्रेस के रचनात्मक कार्यक्रम के बारे में अब तक कुछ नहीं कहा है। उसे निश्चित रूप से जारी रखना चाहिए, परंतु पिछले कुछ वर्षो का अनुभव हमें दरशाता है कि वह हमें तेजी से आगे नहीं ले जाता। वह भावी कारवाइयों के लिए जमीन तैयार करता है तथा दस वर्षो तक खामोशी से किया गया काम आज फल दे रहा है। विशेष रूप से, मुझे आशा है कि हम विदेशी वस्त्रों और ब्रिटिश काल का बहिष्कार जारी रखेंगे।
चूंकि हमारा कार्यक्रम राजनीतिक और आर्थिक बहिष्कार करना था, अत: उससे सारे संबंध तोड़ लेना संभव नहीं होगा। परंतु हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि ब्रिटिश सरकार के साथ हमारे संपर्क बिंदु कम हों और हम आत्मनिर्भर बनें। हमें यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि भारत उन सभी ऋणों की अदायगी की जिम्मेदारी लेने से इनकार किया था तथा हमें इस अस्वीकृति को दोहराना और उस पर डटे रहना चाहिए।
भारत का ऐसा सार्वजनिक ऋण, जो भारत को लाभ पहुंचाने के उददेश्य से लिया गया हो, उसे स्वीकार करने और चुकाने के लिए हम तैयार हैं। परंतु हम उन सभी देनदारियों को चुकाने से पूरी तरह इनकार करते हैं, जो भारत को पराधीन रखने के उद्देश्य से निर्मित हुई थी। भारत की गरीब जनता विशेष रूप से उन युद्धों के खर्च का भार उठाने के लिए तैयार नहीं है, जो इंग्लैंड ने अपना साम्राज्य बढ़ाने या भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए लड़े थे। न ही वे उन दरियादिल रियासतों को स्वीकार कर सकते हैं, जो ब्रिटिश सरकार ने बिना उचित मुआवजे के विदेशी शोषकों को प्रदान की थीं।
मैंने अब तक विदेशों में रहने वाले भारतीयों का जिक्र नहीं किया है और उनके बारे में अधिक कुछ कहना भी नहीं चाहता। पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण अफ्रीका, फिजी या अन्य स्थानों पर रहने वाले हमारे भाइयों-जो भारी कठिनाइयों के बावजूद बहादुरी से संघर्ष कर रहे हैं- के प्रति आत्मीयता के अभाव के कारण ऐसा नहीं है। परंतु उनका भविष्य भारत के मैदानों में तय होगा और जो आंदोलन हम यहां छेड़ रहे हैं, वह उनके लिए उतना ही है जितना हमारे लिए।
इस संघर्ष के लिए हम एक कुशल संगठन चाहते हैं। कांग्रेस का संविधान और संगठन इतना पुराना और सुस्त हो चुका है कि वह आपातकालीन स्थितियों के लिए उपयुक्त नहीं है। विशाल प्रदर्शनों का समय बीत चुका है। अब हम खामोश एवं प्रभावी कार्रवाई चाहते हैं और वह हमारे कार्यकर्ताओं में कठोरतम अनुशासन के जरिए ही संभव हो सकती है। जो प्रस्ताव पास किए जाएं, उन पर अमल हो। कांग्रेस की सदस्य संख्या कितनी भी कम हो जाए, यदि वह अनुशासन के साथ आगे बढ़ती है तो उसकी शक्ति बढ़ेगी। दृढ़-निश्चयी छोटे समूहों ने भी राष्ट्रों की किस्मत बदल दी है। लोगों की भीड़ ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। आजादी स्वयं संयम व अनुशासन की मांग करती है और हममें से प्रत्येक को व्यापक हितों की खातिर अपने हितों को गौण समझना होगा।
कांग्रेस देश के मुट्ठी भर लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं करती और यद्यपि कई लोग इतने कमजोर हो सकते हैं कि वे उसमें शामिल न हो सकें या उसके लिए काम न कर सकें, वे आशा और हसरत भरी दृष्टि से उसकी ओर देखते हैं कि वह उन्हें मुक्ति दिलाएगी। कलकत्ता-प्रस्ताव के पास होने के बाद से ही लोग उत्सुकता से उस महान दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे, जब कांग्रेस की यह बैठक होगी। हममें से कोई नहीं कह सकता कि हम क्या और कब हासिल कर सकते हैं?
सफलता हमारे हुक्म की गुलाम नहीं है। परंतु वह अकसर उन लोगों का वरण करती है, जो साहस करते हैं और कर्म करते हैं, वह उन लोगों के पास कम ही जाती है, जो बुजदिल होते हैं और परिणामों से डरते हैं। हम बड़े खेल खेलते हैं, और यदि हम महान् उपलब्धियां चाहते हैं, तो वे बड़े खतरों में से ही आ सकती हैं। हमें सफलता जल्दी मिले या देरी से, अपने प्रयासों तथा हमारे देश के लंबे और शानदार इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ लिखने से हमें स्वयं के सिवाय कोई नहीं रोक सकता।
देश के विभिन्न भागों में हम पर षड्यंत्र रचने के मामले चल रहे हैं। वे हमारे पुराने साथी हैं। परंतु षड्यंत्रों का समय बीत चुका है। अपने देश को विदेशी शासन से मुक्त कराने की यह खुली साजिश है। साथियो और मेरे देश के सभी सज्जनों व देवियो! इस साजिश में शामिल होने के लिए मैं आपको आमंत्रित करता हूं। परंतु उसके लिए जो पुरस्कार आपका इंतजार कर रहे हैं, वे हैं दु:ख और जेल, परंतु आप भारत-प्राचीन किंतु चिर युवा- के लिए अपना योगदान दे चुके होंगे तथा मानवता को उसकी वर्तमान दासता से मुक्त कराने में सहायता दे चुके होंगे।
(प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित और रुद्रांक्षु मुखर्जी द्वारा संपादित पुस्तक 'भारत के महान भाषण' से साभार।)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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