स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है : तिलक (गणतंत्र दिवस पर विशेष-1)

1. 17 जनवरी : स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है : बाल गंगाधर तिलक

2. 18 जनवरी : पाकिस्तान की संविधान सभा का उद्घाटन भाषण : मुहम्मद अली जिन्ना

3. 19 जनवरी : आपातकाल की घोषणा : इंदिरा गांधी

4. 20 जनवरी : राष्ट्रपति शासन प्रणाली : जे.आर.डी. टाटा

5. 21 जनवरी : वोट देने की आयु को अठारह साल तक घटाना : राजीव गांधी

6. 22 जनवरी : तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा : सुभाषचंद्र बोस

7. 23 जनवरी : पूर्ण स्वराज्य : जवाहरलाल नेहरू

8. 24 जनवरी : भारत की पहली संविधान सभा का समापन भाषण : भीमराव अंबेडकर

--संपादक

आईएएनएस (हिंदी)

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प्रस्तुत है श्रृंखला का पहला भाषण :

स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है

बाल गंगाधर तिलक (1856-1920)

(राष्ट्रीयता की भावना पुनर्जाग्रत करने के लिए तिलक और एनी बेसेंट ने होमरूल लीग्स का गठन किया-बेसेंट ने सन 1915 में और तिलक ने उससे अगले वर्ष। तिलक की होमरूल लीग की पहली वर्षगांठ के अवसर पर यह भाषण दिया गया था। वयोवृद्ध तिलक युवाओं को संबोधित कर रहे थे और उनके शब्द इतने जोशीले थे कि वे राष्ट्रीय आंदोलन का शंखनाद बन गए। तिलक की स्वतंत्रता की मांग को सन 1929 में कांग्रेस के पूर्ण स्वराज्य के प्रस्ताव के रूप में समाविष्ट कर लिया गया था।)

मैं यद्यपि शरीर से बूढ़ा, किंतु उत्साह में जवान हूं। मैं युवावस्था के इस विशेषाधिकार को छोड़ना नहीं चाहता। अपनी विचार-शक्ति को सबल बनाने से इंकार करना यह स्वीकार करने के समान होगा कि मुझे इस प्रस्ताव पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है। अब मैं जो कुछ बोलने जा रहा हूं, वह चिर युवा है। शरीर बूढ़ा जर्जर हो सकता है और नष्ट भी हो सकता है, परंतु आत्मा अमर है।

उसी प्रकार, हमारी होमरूल गतिविधियों में भले ही सुस्ती दिखाई दे, उसके पीछे छिपी भावना अमर एवं अविनाशी है और वही हमें स्वतंत्रता दिलाएगी। आत्मा ही परमात्मा है और मन को तब तक शांति नहीं मिलेगी, जब तक वह ईश्वर से एकाकार न हो जाए। यदि एक शरीर नष्ट हो जाता है तो आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेगी, गीता विश्वास दिलाती है। यह दर्शन बहुत पुराना है।

स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। जब तक वह मेरे भीतर जागृत है, मैं बूढ़ा नहीं हूं। कोई हथियार इस भावना को काट नहीं सकता, कोई आग इसे जला नहीं सकती, कोई जल इसे भिगो नहीं सकता, कोई हवा इसे सुखा नहीं सकती। मैं उससे भी आगे बढ़कर कहूंगा कि कोई सी.आई.डी. इसे पकड़ नहीं सकती।

मैं इसी सिद्धांत की घोषणा पुलिस अधीक्षक, जो मेरे सामने बैठे हैं, के सामने भी करता हूं, कलक्टर के सामने भी, जिन्हें इस सभा में आमंत्रित किया गया था और आशुलिपि लेखक, जो हमारे भाषणों के नोट्स लेने में व्यस्त हैं, के सामने भी। मृत दिखाई देने पर भी यह सिद्धांत अदृश्य नहीं होगा। हम स्व-शासन चाहते हैं और हमें पाना ही चाहिए। जिस विज्ञान की परिणति स्व-शासन में होती है, वही राजनीति-विज्ञान है, न कि वह जिसकी परिणति दासता में हो।

राजनीति का विज्ञान इस देश के वेद हैं। आपके पास एक आत्मा है और मैं केवल उसे जगाना चाहता हूं। मैं उस परदे को हटा देना चाहता हूं, जिसे अज्ञानी, कुचक्री और स्वार्थी लोगों ने आपकी आंखों पर डाल दिया है। राजनीति के विज्ञान के दो भाग हैं-पहला दैवी और दूसरा राक्षसी।

एक राष्ट्र की दासता दूसरे भाग में आती है। राजनीति-विज्ञान के राक्षसी भाग का कोई नैतिक औचित्य नहीं हो सकता। एक राष्ट्र जो उसे उचित ठहराता है, ईश्वर की दृष्टि में पाप का भागी है। कुछ लोगों में उस बात को बताने का साहस होता है, जो उनके लिए हानिकारक है और कुछ लोगों में यह साहस नहीं होता।

लोगों को इस सिद्धांत के ज्ञान से अवगत कराना चाहता हूं कि राजनीतिक और धार्मिक शिक्षा का एक अंग हैं। धार्मिक और राजनीतिक शिक्षाएं भिन्न नहीं हैं, यद्यपि विदेशी शासन के कारण वे ऐसे प्रतीत होते हैं। राजनीति के विज्ञान में सभी दर्शन समाए हैं।

स्व-शासन का अर्थ कौन नहीं जानता? कौन उसे नहीं चाहता? क्या आप यह पसंद करेंगे कि मैं आपके घर में घुसकर आपकी रसोई अपने कब्जे में ले लूं? अपने घर के मामले निपटाने का मुझे अधिकार होना चाहिए। केवल पागल व्यक्ति और बच्चे अपने मामले स्वयं नहीं निपटा सकते।

सम्मेलनों का मुख्य सिद्धांत यह है कि एक सदस्य इक्कीस वर्ष की आयु से अधिक होना चाहिए, इसलिए क्या आप नहीं समझते की आपको अपना अधिकार मिलना चाहिए? पागल या बच्चे न होकर आप अपने मामले, अपने अधिकार समझते हैं और इसीलिए आप जानते हैं कि स्व-शासन क्या है।

हमें कहा गया है कि हम स्व-शासन के उपयुक्त नहीं हैं। एक शताब्दी गुजर गई है और ब्रिटिश शासन हमें स्व-शासन के लायक नहीं बना पाया। अब हम अपने प्रयास करेंगे और स्वयं को उस लायक बना लेंगे। असंगत बहाने बनाना, लालच देना और वैकल्पिक प्रस्ताव करना ब्रिटिश नीतियों पर एक दाग है। इंग्लैंड भारत की सहायता से बेल्जियम जैसे छोटे से देश को संरक्षण देने का प्रयास कर रहा है, फिर वह कैसे कह सकता है कि हमें स्व-शासन नहीं मिलना चाहिए। जो हममें दोष देखते हैं। हमें किसी बात की परवाह किए बिना अपने राष्ट्र की आत्मा की रक्षा करने के लिए कठोर प्रयास करने चाहिए।

अपने उस जन्मसिद्ध अधिकार की रक्षा में ही हमारे देश का हित छिपा हुआ है। कांग्रेस ने स्व-शासन का यह प्रस्ताव पास कर दिया है। प्रांतीय सम्मेलन कांग्रेस की ही देन है, जो उसके आदेशों का पालन करता है। हम अपने पिता, कांग्रेस के आदेशों का पालन श्रीरामचंद्र की तरह ही करेंगे। इस प्रस्ताव को लागू कराने हेतु कार्य करने के लिए हम कृतसंकल्प हैं, चाहे ऐसे प्रयास हमें मरुभूमि में ही ले जाएं, चाहे हमें अज्ञातवास में रहना पड़े, चाहे हमें कितने ही कष्ट उठाने पड़ें या अंत में चाहे जान ही गंवानी पड़े।

श्रीरामचंद्र ने ऐसा किया था। उस प्रस्ताव को केवल तालियां बजाकर पास न कराएं, बल्कि इस प्रतिज्ञा के साथ कराएं कि आप उसके लिए काम करेंगे। हम सभी संभव संवैधानिक और विधिसम्मत तरीकों से स्व-शासन की प्राप्ति के लिए कार्य करेंगे।

ईश्वर की कृपा से इंग्लैंड ने हमारे बारे में अपना नजरिया बदल लिया है। हम महसूस करते हैं कि हमारे प्रयास असफल नहीं होंगे। इंग्लैंड ने अहंकारवश समझा था कि इतने बड़े साम्राज्य को वह छोटा-सा राष्ट्र केवल अपने बल पर बनाए रख पाएगा। वह अहंकार अब कम हो गया है। इंग्लैंड को अब महसूस होने लगा है कि उसे साम्राज्य के संविधान में बदलाव लाने होंगे।

लॉयड जॉर्ज ने खुलकर स्वीकार किया कि भारत के सहयोग के बिना इंग्लैंड अब चल नहीं सकता है। एक हजार वर्ष पुराने एक राष्ट्र के बारे में सारी धारणाएं बदलनी होंगी। इंग्लैंड के लोगों को पता चल गया है कि उनके सभी दलों की अक्लमंदी पर्याप्त नहीं है। फ्रांसीसी रणभूमि में भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सैनिकों की जान बचाकर अपनी बहादुरी का परिचय दिया है। जो लोग कभी हमें गुलाम समझते थे, अब हमें भाई कहने लगे हैं। ये सब परिवर्तन ईश्वर की कृपा से हुए हैं।

अभी, जब अंग्रेजों के मन में भाइचारे की भावना मौजूद है, हमें अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाना चाहिए। हमें उन्हें बता देना चाहिए कि हम 30 करोड़ भारतीय साम्राज्य के लिए अपनी जान भी देने को तैयार हैं - और यह कि जब तक हम उनके साथ हैं, साम्राज्य की ओर कोई आंख उठाकर भी नहीं देख सकेगा।

(प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित और रुद्रांक्षु मुखर्जी द्वारा संपादित पुस्तक 'भारत के महान भाषण' से साभार।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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