शेख हसीना ने मांगी अमन की दुआ

शेख हसीना ने मांगी अमन की दुआ

नारायण बारेठ

बीबीसी संवाददाता, जयपुर

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना अपनी भारत यात्रा के दौरान अजमेर में ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जियारत करने भी पहुँचीं.

बुधवार को शेख़ हसीना दरगाह परिसर में क़रीब 50 मिनट तक रहीं और दोनों देशों में शांति और बेहतर रिश्तों के लिए दुआ की.

उनकी यात्रा को देखते हुए दरगाह और उसके आसपास सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए थे.

इस दौरान वहाँ किसी को भी जाने की इज़ाज़त नहीं दी गई.

सुफ़िआना माहौल

शेख़ हसीना जब ख़्वाजा के दरबार में हाज़िरी देने पहुँचीं तो वहाँ का माहौल काफ़ी सुफ़ियाना था. उनके साथ बहन रेहाना और अन्य परिजन भी थे.

दरगाह के निज़ाम दरवाज़े पर प्रधानमंत्री का पारंपरिक रूप से स्वागत किया गया.

दरगाह के नाज़िम अहमद राजा और दीवान ने उनकी अगवानी की. दरगाह प्रबंधन ने शेख़ हसीना को सम्मान के रूप में एक तलवार भेंट की.

ख़ादिमों की संस्था ने उन्हें अभिनंदन पत्र भेंट किया और तबर्रुक़ नज़र किया.

दरगाह के नाज़िम अहमद राजा ने बताया, ''हमने पारंपरिक तौर-तरीक़े से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री का स्वागत किया. उन्हें एक राष्ट्राध्यक्ष को दिया जाना वाला सम्मान दिया गया."

राजा ने बताया, "शेख़ हसीना ने बहुत आस्था के साथ यहाँ इबादत की और ख़्वाजा के दरबार में चादर और अक़ीदत के फूल चढ़ाए."

सद्भभावना का प्रतीक

ख़ादिम कलीमुद्दीन चिश्ती ने बीबीसी को बताया, "शेख़ हसीना ने दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों के लिए दुआ की. उन्होंने अपने मुल्क के लिए भी दुआ की."

उन्होंने बताया, "शेख़ हसीना और उनके परिवार की ख़्वाजा साहिब में गहरी आस्था है. उनके परिजन भी अजमेर आते रहे है, मुझे याद है कि शेख़ हसीना के वालिद साहिब मरहूम शेख मुजीबुरहमान साहिब भी 1946 में यहाँ जियारत के लिए आए थे."

शेख़ हसीना को ख़्वाजा साहिब की जीवन पर आधारित एक किताब भी भेंट की गई.

ख़ादिमों की संस्था के सरवर चिश्ती ने बताया, "यह दरगाह वह मक़ाम है जिसके प्रति पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में गहरी आस्था है. मेरे ख़्याल में बांग्लादेश के सभी हुक़मरान यहाँ जियारत के लिए आते रहे है. ख़्वाजा के दरबार में क्या आम क्या ख़ास सभी हाज़री देते हैं."

उन्होंने कहा, "यह वह मक़ाम है जो सदियों से अमन और भाईचारे का पैग़ाम देता रहा है. इसीलिए ख़्वाजा के प्रति आस्था मुल्कों की सरहदों में नहीं बंधी और न ही मज़हब की सीमा में तंग हुई."

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