एक था फिरंगी राजा

नई दिल्ली, 10 जनवरी (आईएएनएस)। सौ वर्ष पूरे हुए हैं, हिन्द स्वराज को लिखे हुए। पुस्तक में 'स्वराज क्या है' नामक अध्याय में पाठक संपादक से कहता है कि ''अंग्रेजों के राज-कारोबार से देश कंगाल होता जा रहा है। वे हर साल देश से धन ले जाते हैं।'' कड़वी सच्चाई के इस लंबे संवाद से कोई सड़सठ बरस पहले की एक सच्ची घटना का वर्णन है फिरंगी राजा के इस किस्से में। इसमें अच्छा-बुरा सब कुछ है।

हिन्द स्वराज में गांधीजी ने अपने इस पाठक से कहा था कि ''अच्छा हम मान लें कि हमारी मांग के मुताबिक अंग्रेज चले गए।'' उसके बाद आप क्या करेंगे। पाठक का जवाब था, ''उनका बनाया हुआ विधान हम चालू रखेंगे और राज का कारोबार चलाएंगे।'' तब गांधी जी ने कहा था : ''आप बाघ का स्वभाव तो चाहते हैं, लेकिन बाघ नहीं।'' किस्सा यही बताता है कि बाघ गया पर उसका स्वभाव आज भी बना हुआ है।

महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों ने जीवन मुक्ति के लिए हिमालय की कठिन राह पकड़ी थी। यहीं से वे स्वर्ग सिधार गए थे। द्वापर की इस घटना के बाद इस कलियुग में भी हम एक अंग्रेज की कथा सुनते हैं जो युद्ध की त्रासदी से विमुख होकर हिमालय की शरण में आया था।

इस फिरंगी का नाम विलसन था। पहले अफगान युद्ध (सन् 1842) में अमीर शेर अली (दोस्त मोहम्मद के बेटे) के हाथों से अंग्रेजों की करारी हार हुई थी। उस अपमानजनक हार के बाद विलसन उत्तराखंड में शरण लेने चला गया था। गंगोत्री से 13 किलोमीटर पहले मुखवा नाम के गांव में उसे शरण मिली थी। भागीरथी घाटी में आखिरी गांव मुखवा है। इसमें गंगा के पुजारी रहते हैं। इन्हें गंगोत्री के पंडे कहते हैं। सर्दियां शुरू होने पर गंगोत्री मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं। तब अधिष्ठातृ देवी की प्रतिमा को मुखवा में लाकर प्रतिष्ठित कर देते हैं।

विलसन ने अपनी बंदूक सहित मुखवा में जब कदम रखा तो पहले-पहल खेतों में से उसके गुजरने पर बहुएं और माताएं डर कर भाग जाती थीं। उन्होंने ऐसा लंबा तगड़ा लाल चेहरे वाला 'दैत्य' पहले कभी नहीं देखा था।

सैकड़ों साल पहले किन्ही मजबूरियों के कारण मुखवा पंडे भी इधर चले आए थे। मुखवा में 1983 में सेमवाल पंडों के लगभग 100 तथा दूसरी जातियों के 30 घर थे। कुछ ठाकुर थे और कुछ हरिजन। 134 साल पहले मुखवा की छोटी-सी बस्ती में सेमवालों के कुछ घरों के अलावा 4-5 घर बाजगी के थे। बाजगी जात के इन लोगों को मंदिर में देवोत्थान के समय बाजा बजाने के लिए सेमवालों ने यहां बसाया था।

मुखवा के ब्राह्मण तो विलसन को म्लेच्छ ही समझते थे। गांव के मौतगु दास ने उसे आश्रय दिया। दास अस्पृश्य माने जाते थे। उनका मुख्य काम ढोल, नगाड़ा और तुरही बजाना था। शुभ-अशुभ सभी कार्यो में वे बाजे बजाते। ये सामान्यतया सवर्णो के घरों और मंदिरों के भीतर नहीं जाते थे। मंदिर के आंगन में ही प्रवेश द्वार की सीढ़ियों के पास खड़े होकर ढोल बजाकर देवात्थान करते। शादी जैसे मंगल कार्यो में और शव यात्रा में बाजे बजाते। इनके मुख्य बाजे हैं : ढोल, नगाड़ा, रणसिंह (तुरही), भेरी, क्लरिओनेट और शहनाई। ये बजाने का पेशा करते इसलिए गढ़वाल में इन्हें बाजगी कहते हैं।

बाजगियों से मिलता-जुलता पेशा करने वाली एक जाति है - बेड़ा या बादी। गांवों और गलियों में ये ढोलक पर नाचते, बदलते मौसम के गीत गाते, दर्शकों और श्रोताओं का मनोरंजन करते। वसंत ऋतु में जब पहाड़ और घाटियां सजी-संवरी होतीं तब बादी नर्तक और गायक समा बांध देते। मैदानों में जब किसी के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग करते हुए सुनते हैं तो झट ख्याल आता है कि वह भंगी का काम करता होगा। गढ़वाल में हरिजन शब्द इस भाव को प्रकट नहीं करता। वहां घरों से मैला उठाने का काम कोई नहीं करता। गढ़वाल में बाजगियों, बादियों, लोहारों, बढ़इयों, नाइयों और दर्जियों की गणना हरिजनों में की जाती रही हैं।

मुखवा के सवर्णो और दासों में अंतर यह था कि दास अनपढ़, गरीब, भूमिहीन और हर तरह से पंडों पर आश्रित थे। पंडों से उन्हें जो अनाज तथा दान मिल जाता था, उस पर गुजर कर संतुष्ट रहते थे।

विलसन के आने से उनके जीवन में परिवर्तन आने लगा। वह उन्हें अपने साथ शिकार पर जंगल ले जाता था और मजदूरी में नकद पैसे देता था। उन दिनों यहां दैनिक मजदूरी की दर एक आना प्रति व्यक्ति होती थी। विलसन उन्हें दो आना देने लगा था।

शिकार में विलसन का मुख्य लक्ष्य तो मुनाल नामक पक्षी और कस्तूरी मृग होते थे, पर भरल, तुतराल आदि जो भी सामने आ जाता, वह उसे मार लेता। उनकी खालें वह खुद सावधानी से उतारता, जिससे वे क्षतिग्रस्त न हों। अपने सहायक शिकारियों, मुखवा के दासों को भी उसने खलियाना सिखा दिया था। खालों का प्रारंभिक उपचार वह यहीं पर करके उन्हें जमा करता था। बेहद ठंडी जलवायु में वे खराब नहीं होती थीं। काफी मात्रा में कस्तूरी का नाफा, खालें जमा हो जाने पर वह उन्हें मसूरी-देहरादून में बेच आता।

उन दिनों टकनोरी लोग मांस के लिए कस्तूरी मृग का शिकार किया करते थे। कस्तूरी के नाफों को मामूली सी कीमत में बेच देते थे। विलसन से उन्होंने कस्तूरी की कद्र करनी सीखी। सारा गांव हांका करके कस्तूरी मृगों को विलसन की तरफ खदेड़ देता। शिकार के एक ही दौर में वह ढेर सारे मृग मार लेता। उनके नाफे काट कर खाल और गोश्त हकैयों में बांट देता। निर्यात करने से पहले नाफे धूप में सुखाए जाते। हरसिल वाले बंगले के आंगन में धूप में फैलाए हुए नाफों की तादाद इतनी अधिक हो जाती कि उनकी तुलना सूखे हुए गेहूं के दानों से की जाती थीं! कस्तूरी ने उसका भाग्य पलट दिया। उसे बेच कर वह मालामाल हो गया।

अब विलसन का व्यापारिक मस्तिष्क हिमालय के इन अछूते जंगलों को दोहने की एक बड़ी योजना पर काम कर रहा था। उसे शुरू करने की अनुमति लेने व टिहरी दरबार पहुंचा। भागीरथी घाटी में खड़े लंबे और मोटे तने वाले देवदार वृक्षों को काटकर वह उनकी कीमती लकड़ी को मैदानों में बेचना चाहता था। महाराजा उसकी योजना को सुनकर हंसे। उन्होंने अचंभे से पूछा कि इस कीमती लकड़ी को भला मैदानों तक ढोकर कैसे ले जाओगे?

टिहरी गढ़वाल के इतिहास में शायद पहली बार सन् 1850 के आसपास विलसन ने अछूते शंकु वनों का 400 रुपए की नाममात्र वार्षिक राशि देकर अप्रतिबंधित पट्टा हासिल कर लिया। जंगल के पट्टेदार के रूप में विलसन ने निस्संदेह ऊंचे पहाड़ों के अछूते जंगलों का अंधाधुंध विनाश किया। करीब 15 बरस तक वह पूरी निष्ठुरता से अपना कुल्हाड़ा चलाता रहा और उसने टकनौर, बाड़हाट तथा भंदर्सू के पहाड़ों को देवदार के पके वृक्षों से विहीन कर दिया। उसके दोहन ने चुन-चुन कर सबसे बढ़िया माल उठा लिया और काटे हुए अधिकांश पेड़ों को जंगल की धरती पर सड़ने के लिए छोड़ दिया।

एस.पी. साही ने नॉर्दर्न फारेस्ट रेंजर्स कॉलेज मैगजीन के सन् 1961-62 के अंक में लिखा है कि विलसन द्वारा जंगल में छोड़े गए माल, वृक्षों के लट्ठे और पुराने ठूंठों के दूर-दूर तक फैले कब्रिस्तान थे। मौसम के विनाशकारी थपेड़ों की मार खाते हुए इन्हें लगभग एक शताब्दी का लंबा समय गुजर चुका था।

विलसन उत्तराखंड के कठिन तथा दुर्गम इलाकों में वनों का दोहन करने वाला, प्रदेश में कीमती इमारती लकड़ी को प्राकृतिक जल-धाराओं, नदियों के जरिए बहाकर नीचे मैदान में ले जाने वाला पहला आदमी था। भागीरथी की वेगवती धारा के जरिए वह अपनी लकड़ी को नीचे हरिद्वार तक बहा ले जाता था।

वैज्ञानिक बताए गए वन दोहन के इतिहास में यह युगान्तकारी कदम था। बहान को व्यवस्थित करने के लिए उसने भागीरथी और उसकी सहायक नदियों के प्रवाह के साथ बार-बार यात्रा करके विभिन्न महीनों में भागीरथी के स्वाभाविक स्वरूप का बारीकी से अध्ययन किया। मार्ग की सभी संभावित बाधाओं तथा कठिनाइयों का जायजा लिया और तब जलावतरण के लिए अनुकूलतम मौसम का सही-सही निर्धारण किया था।

लंबे पेड़ों को काटकर वह बेलनाकार तने की डेढ़ से दो मीटर लंबी गेलियां बनवाता। सूख जाने पर गेलियों को नदियों में बहा दिया और फिर हरिद्वार में उन्हें पकड़ लिया जाता। देवदार की एक गेली तीन दिन और तीन रात में हरसिल से हरिद्वार पहुंचती थी। उन दिनों आरे से चिरान करके पहाड़ में शहतीर नहीं बनाए जाते थे।

टकनौर, बाड़ाहाट और भंदर्सू के विस्तृत क्षेत्रों में एक समान मोटाई के तने वाले देवदार के नए वृक्षों की अब जो फसल खड़ी है, उसमें अधिक उम्र वाले वृक्षों का पूर्णतया अभाव एक खास बात है।

पहाड़ों पर आने-जाने के परंपरागत मार्गो में जरूरत के अनुसार फेर-बदल कर विलसन ने अपने काम के लिए नए रास्ते, पगडंडियां बना ली थीं। उन पर पुल बनाए थे। हरसिल, कांट बंगाला (उत्तरकाशी), धरासू, धनोल्टी, काणा ताला, झालकी और मसूरी में उसने बंगले बनाए थे। उसके विकसित किए हुए मार्गो को विलसन मार्ग कहा जाने लगा था। मसूरी से मुखवा तक विलसन मार्ग था : मसूरी-धनोल्टी-काणा ताल-बंदवाल गांव होते हुए भल्दियाणा। वहां से भागीरथी पार करके लंबगांव होते हुए नगुणा। नगुणा से धरासू-डुण्डा-उत्तरकाशी-मनेरी-भटवाड़ी-गंगनानी-सुक्खी-झाला-हरसिल-मुखवा।

विलसन के सभी मार्गो पर उसके गुमाश्ते लगातार तैनात रहते। हरसिल से हरिद्वार तक उसके हजारों लोग पेड़ों की छपान-कटान, चिरान, बहान और ढुलान के कामों में लगे रहे। इस हलचल से सैकड़ों लोगों का आना-जाना बढ़ गया था। विलसन अपने हर काम के लिए पैसा देता था। बाद में तो उसने अपना ही सिक्का चला दिया था। अब तो क्षेत्र में लेन-देन में विलसन की हुंडी तथा सिक्का चलने लगा और हरिद्वार पार तक इनका प्रचलन हो गया था। विलसन की मुद्रा प्रणाली, टोकन को लोग पहाड़ों के परिवेश और प्रतिकूल परिस्थितियों में व्यावहारिक और लाभदायक बताते थे और इस प्रणाली में एक, दो, पांच और दस रुपए की मुद्राएं, टोकन जारी किए गए थे।

भागीरथी घाटी में इस बेताज फिरंगी राजा का बरसों अघोषित राज्य रहा। जन-साधारण उसका आदर तक करने लगे थे। वह दूरदराज की इस घाटी में आया तो बस एक शिकारी की तरह था। पर फिर वह धीरे-धीरे कुशल व्यापारी, चतुर राजनीतिज्ञ और योग्य डॉक्टर के रूप में उभर आया। उसके कामों का सिक्का तो गढ़वालवासियों के दिलो-दिमाग में जम ही गया था और अब टकसाली सिक्का भी यहां के समाज के व्यापारिक लेन-देन में जम चला था।

महत्वाकांक्षी विलसन जब चरम उत्कर्ष पर था तो कुछ लोग उससे डाह करने लगे। इन लोगों ने ब्रिटिश अधिकारियों के कान भरे। उनका सबसे बड़ा आरोप था कि विलसन अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की दिशा में सक्रिय है। उसने अपनी मुद्रा प्रणाली तो जारी कर ही दी है। इस आरोप को बेबुनियाद बताते हुए वाक्पटु विलसन ने तर्क दिया था कि तथाकथित विलसन मुद्रा तो महज एक टोकन प्रणाली थी, जो लोगों की सुविधा के लिए जारी की गई थी। नकद रुपया लेने, भुनाने, लाने-ले जाने में चोरी और लूट का खतरा बना रहता था। विलसन टोकन प्रणाली में ऐसे खतरे नहीं थे। विलसन ने हिमालय में खूब दौलत कमाई। गढ़वाल के लोग उसे सोना कु सौथलो (सोने की चिड़िया) कहते थे। इन लोगों ने विलसन नाम को गढ़वाली बोली के अनुरूप बदल लिया था। अब वे उसे हुलसिंह साहिब कहते थे।

विलसन के कारोबार में मुखवा गांव का प्राय: हर परिवार किसी-न-किसी रूप में जुड़ गया था। उनके पास बड़ी संख्या में विलसन के सिक्के रहते थे। विलसन का कारोबार खत्म हो जाने पर इन सिक्कों की कद्र जाती रही। लोगों के घरों में ढेर-के-ढेर पड़े सिक्के एकाएक बेकार हो गए। नई पीढ़ी के लोग बताते थे कि इन्हें बूढ़ी दादियों ने तराजू के पलड़े में चढ़ाकर धातु के प्रचलित भाव पर फेरी वालों तथा कबाड़ियों को बेच दिया था।

भागीरथी घाटी तब आर्थिक दृष्टि से बेहद पिछड़ी हुई मानी जाती थी। जंगलों का दोहन तो होता नहीं था। पहाड़ी भूमि में धन-धान्य, स्वादिष्ट फल और सब्जियों की लाभदायक फसलें नहीं उगाई जाती थीं। विलसन ने यहां बागवानी और उन्नत कृषि की नींव डाली। उसने सेब, आलू बुखारा, खुमानी और नाशपाती के कई बगीचे लगाए। अपने हरसिल बंगले के सामने फलों का एक बड़ा बगीचा लगाया। उसके रोपे हुए पेड़ सालों तक फल देते रहे। उससे प्रेरणा पाकर दूसरे लोगों ने फलों के वृक्ष लगाए। मुखवा गांव के लोग बताते हैं कि आजकल सेबों की जो उन्नत किस्में उगाई जा रही हैं, उनसे विलसन के सेब कहीं अच्छे थे। रूप-रंग, आकार, रसीलापन, स्वाद, सुगंध, निरोक रहने की क्षमता, टिकाऊपन आदि सभी दृष्टियों से वे बेहतर थे।

राजमा, आलू और गेहूं को भागीरथी घाटी में लाने का श्रेय विलसन को दिया जाता है। गेंहू आने से पहले यहां फाफरा और रामदाना की ही खेती की जाती थी। घाटी के लोगों का मुख्य आहार यही था। टिहरी गढ़वाल के ऊंचे तालाबों, तालों में उसने मछलियां भी छोड़ीं।

सन् 1900 के आसपास हरसिल में रावलपिंडी के राजा रामब्रह्मचारी आकर बस गए थे। उन्होंने इस इलाके को समृद्ध करने में खूब योगदान दिया। एक तरह से उन्होंने विलसन के अच्छे माने गए कार्यो को आगे बढ़ाया। सेब के नए बगीचे लगाए। वे यहां आए तो थे अपना घर-बार छोड़कर तपस्वी का जीवन बिताने। उन्होंने तीर्थयात्रियों के विश्राम के लिए हरसिल में चट्टी बनाई थी। टिहरी दरबार की अनुमति लेकर संगम के टापू में बने लक्ष्मीनारायण मंदिर को बड़ा किया था। बाद में उन्होंने धराली की पंवार लड़की से शादी कर ली थी। 108 बरस की अवस्था में उनका शरीरांत हुआ था।

वापस विलसन या हुलसिंह पर लौटें। शिकार के दौरे में मारे गए पशु-पक्षियों के गोश्त को विलसन अपने सहायक शिकारियों और मुखवा गांव के पंडों में बांट देता था। ठंडे प्रदेश में रहने वाले इन लोगों को मांस-मदिरा से परहेज नहीं था। विलसन बड़े पैमाने पर शिकार करता था, जिससे सवर्णो और दासों दोनों की भोजन संबंधी आवश्यकता पूरी होती थी। वह मुखवा की छोटी-सी बस्ती का अंग बन गया था। सवर्णो में उठने-बैठने लगा था, दासों से घुलमिल गया। मंगितु बाजगी का घर तो जैसे उसका अपना घर बन गया था। मंगितु विलसन के हकैयों और शिकारियों का अगुआ था।

मंगितु की एक बहिन थी- सुवदा। उसकी किसी बात पर पति का घर छोड़कर वह मायके आ गई थी। मुखवा में ही रहा करती थी। बाद में उसके साथ विलसन का विवाह हो गया। उनकी संतान नहीं हुई। उसके निस्संतान मर जाने पर अपना वंश चलाने के लिए विलसन ने मंगितु की लड़की रायमिता से विवाह कर लिया।

विवाह के बाद विलसन ने अपनी ससुराल वालों को उठाने की कोशिश की। रायिमता के भाई सुबध्यानु को देहरादून के दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज में पढ़ने के लिए भेजा गया। हाई स्कूल की परीक्षा करके वह मुखवा वापस आ गया था। पंडों के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाता था। मुखवा के लोग उसे सुबध्यानु मास्टर कहते थे।

रायिमता से विलसन की तीन संतानें हुईं। सभी का जन्म मुखवा में हुआ। इनके नाम थे - चार्ली, ऐन्द्री और नत्थू। तीनों टकनौरी बोलते थे। सुक्खी से ऊपरी मुखवा गंगोत्री क्षेत्र टकनौर कहलाता है। हरसिल से जालंधरी नदी के साथ-साथ दुखन खाका होते हुए हिमाचल के किन्नौर क्षेत्र की सीमा है। इस मार्ग से अब भी किन्नौरी लोग गंगोत्री की तीर्थ यात्रा पर आते हैं। यह मार्ग अगस्त में कुल 15 से 20 दिन के लिए खुलता है। इसी रास्ते से विलसन कुल्लू से फलों के पौधे, आलू के बीज आदि हरसिल लाया था।

विलसन का सबसे बड़ा बेटा चार्ली विलसन के तीनों बेटों में अधिक समझदार था। उसने पिता की भारी कमाई से देहरादून और मसूरी में आलीशान भवन बना लिए थे। वह यहीं रहने लगा था। मसूरी में उनका चार्ली विला होटल तब बहुत प्रसिद्ध हो गया था। यह होटल लगभग आधी शताब्दी तक भारतीय और विदेशी अभिजात्यों की सेवा करता रहा। यह भी उल्लेखनीय है कि इसी में अब लालबहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी है, जहां से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, कलेक्टर आदि तैयार होते हैं।

(यह लेख अनियतकालीन पत्रिका 'पहाड़' के नौवें अंक में विस्तृत रूप में प्रकाशित है। यहां प्रस्तुत इसका संक्षिप्त अंश 'गांधी-मार्ग' पत्रिका से लिया गया है)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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