'सऊदी में जीना मुश्किल हो गया था'

'सऊदी में जीना मुश्किल हो गया था'

नारायण बारेठ

बीबीसी संवाददाता, जयपुर

सऊदी अरब के मदीना से बिना पासपोर्ट और यात्रा टिकट के एयर इंडिया के विमान के शौचालय में छिपकर भारत चले आए मुरादाबाद के हबीब को जमानत नहीं मिल सकी है.

उसे शनिवार को जयपुर की एक अदालत में पेश किया गया, जहाँ उसे और दो दिन के लिए पुलिस अभिरक्षा में भेज दिया गया.

अदालत से बाहर निकले हबीब ने कहा, "ज़िंदगी वहाँ नरक हो गई थी. हम बहुत परेशान होकर भारत चले आए, बीबी बच्चे यहाँ मर रहे थे और मैं वहाँ था. फिर मैं क्या करता?"

ये कहते-कहते हबीब की आँखों में आंसूओं का दरिया बह निकला.

हबीब को गत शुक्रवार को जयपुर में उस वक़्त गिरफ्तार किया गया था जब एयर इंडिया के कर्मचारियों ने उसे पुलिस के हवाले किया और बताया कि वह विमान के शौचालय में छिपकर आया है.

अपनी उम्र के मुक़ाबले बहुत थके हुए दिख रहे हबीब ने बीबीसी से कहा, "मेरे सामने और कोई चारा नहीं था. इसीलिए मैंने विमान में छिप कर आने का रास्ता चुना, मेरा पासपोर्ट छीन लिया गया, मैं अकेला ही नहीं, और भी भारतीय ऐसी ही परेशानी भरी ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं."

हबीब कहते हैं, "वहाँ दलाल बहुत सक्रिय हैं, जाते ही इंसान को दलाल ख़रीद लेते हैं, जो ख़्वाब लेकर गए थे, वो चूर-चूर हो गए. हम ही जानते हैं कि अकेले जीवन कैसे गुजरता था."

उससे पूछा गया कि भारतीय दूतावास ने कोई मदद की, तो हबीब ने कहा, "वो हमारी नहीं उन लोगों यानी नियोक्ता की सुनते है."

वे कहते हैं, ''मेरी सबसे विनती है कोई रोज़गार के लिए सऊदी अरब न जाए, वहाँ परेशानी के अलावा कुछ नहीं है. अल्लाह ने चाहा तो मैं अपने घर पहुँचा और बीबी बच्चों से मिलूँगा."

वो कहते हैं कि वो कई बार अकेले किसी कोने में बैककर रोते थे.

गुहार और राहत

उनकी रिहाई के लिए मुरादाबाद से भाई जलालुद्दीन और चार और लोग आए थे.

जलालुद्दीन ने हालत का बयां करते हुए कहा, "मेरा भाई बहुत परेशान था, उसे भोजन भी 24-24 घंटे में दिया जाता था. उसे केवल एक माह की पगार दी गई."

वे कहते हैं, ''मेरा भाई कोई गुनाहगार नहीं है, उसके दो छोटे बच्चे हैं,बीबी है, बहुत दुखी होकर उसने ये रास्ता चुना, हमारी सरकार से गुहार है कि उसे छोड़ा जाए."

ये कहते-कहते जलालुदीन की आंखें भर आईं.

हबीब की माँ बीमार हैं.

जलालुद्दीन कहते हैं, ''मैंने इससे मना किया था कि वो सऊदी अरब न जाए.पर तब तक ये एजेंट को 30 हजार रूपये दे चुका था. एजेंट ने हबीब की ज़मीन एक लाख तीस हज़ार में बिकवा दी और तमाम रकम एजेंट ले गया."

जलालुद्दीन अपनी मुश्किलों का जिक्र करते हैं और कहते है, "अभी भी ज़मीन के बदले पहले दो हजार रूपये लेकर आया, फिर रूपये कम पड़ गए तो ज़ेवर आदि बेचकर और रिश्तेदारों से जुगाड़ कर कुछ पैसे लाया हूँ."

जलालुद्दीन और उनके साथ आए रिश्तेदारों को लग रहा है कि हबीब बेशक हिरासत में है, लेकिन है तो अपनी सरज़मी पर. अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए जलालुदीन कहते हैं- "इंशा अल्ल्लाह वो दिन भी आएगा जब हबीब रिहा होकर घर आएगा."

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