बिहार में चिकित्सकों की हड़तालों के दौरान 511 मरीजों की मौत
पटना, 26 दिसम्बर (आईएएनएस)। बिहार में पिछले चार वर्षो के दौरान चिकित्सकों द्वारा बार-बार की गई हड़तालों के दौरान 511 मरीजों को अपनी जान गंवानी पड़ी, लेकिन राज्य मानवाधिकार आयोग (एसएचआरसी) की संस्तुति के बाद भी राज्य सरकार ने अभी तक हड़ताली चिकित्सकों के लाइसेंस रद्द करने की योजना नहीं बनाई है।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार राज्य में पिछले चार वर्षो के दौरान चिकित्सक नौ बार हड़ताल पर गए। हड़ताल की वजह मेहनताना बढ़ाने की मांग रही है।
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री नंद किशोर यादव ने कहा, "मैंने मंगलवार को राज्य विधान परिषद में चिकित्सकों की हड़तालों के दौरान होने वाली मौतों की संख्या का उल्लेख किया था।"
आधिकारिक आंकड़ो के अनुसार 2009 के दौरान चिकित्सकों ने दो बार हड़ताल की थी जिस दौरान 239 लोगों की मौत हुई। पटना मेडिकल कॉलेज (पीएमसीएच) में नौ से 21 नंवबर तक की गई चिकित्सकों की हड़ताल के दौरान 178 मरीजों की जान गई। वहीं अगस्त में पटना चिकित्सा कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) में चिकित्सकों की हड़ताल के दौरान 61 मरीजों ने दम तोड़ दिया था।
दोनों अवसरों पर हड़ताल पर गए 500 कनिष्ठ चिकित्सक अपने मेहनताने में इजाफे की मांग कर रहे थे। हड़ताल के दौरान दरभंगा मेडिकल कॉलेज (डीएमसीएच) के 250 चिकित्सक भी पीएमसीएच चिकित्सकों के समर्थन में हड़ताल पर चले गए थे।
गौरतलब है कि वर्ष 2006 में हड़ताल के दौरान 59 मरीजों की जान चली गई थी। जबकि, वर्ष 2007 में 81 और 2008 में 132 मरीजों ने चिकित्सकों की हड़ताल के दौरान दम तोड़ दिया।
भारतीय चिकित्सा संगठन के बिहार इकाई के अध्यक्ष रमेश प्रसाद सिंह ने कहा, "पीएमसीएच और डीएमसीएच के चिकित्सकों सहित सरकारी अस्पतालों के सैकड़ों चिकित्सक हड़ताल पर चले गए थे।"
उल्लेखनीय है कि राज्य मानवाधिकार आयोग की संस्तुति के बाद भी हड़ताली चिकित्सकों का लाइसेंस रद्द करने की राज्य सरकार ने अभी तक कोई योजना नहीं बनाई है।
जबकि, राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और अवकाश प्राप्त न्यायाधीश एस. एन. झा ने आईएएनएस से कहा, "चिकित्सकों द्वारा हड़ताल के नाम पर गरीब मरीजों के मानवाधिकारों का उल्लंघन हम दोबारा बर्दाश्त नहीं करेंगे।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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