समझौते की उम्मीद कम: पर्यावरण मंत्री

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने आशंका जताई है कि जलवायु परिवर्तन पर दुनिया भर के देशों के साथ कोई आम सहमति शायद ही बन पाए. उन्होंने कहा कि इसके लिए अब सिर्फ़ तीन दिन और बचे हैं लेकिन सदस्य देशों के बीच चल रही बातचीत में स्पष्टता की कमी है.
कोपेनहेगेन में चल रही बातचीत में अभी इसी मुद्दे पर विवाद चल रहा है कि कौन ग्रीनहाउस गैसों में कटौती करे और कितनी करे. जैसे जैसे समय बीत रहा है क़ानूनी रूप से बाध्यकारी किसी समझौते की उम्मीद तो अब बहुत कम रह गई है, हालांकि ऐसी उम्मीद अभी भी बनी हुई है कि शायद कोई राजनैतिक सहमति बन जाए.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए एक साक्षात्कार में जयराम रमेश ने कहा, 'अभी भी इस मुद्दे पर भ्रम की स्थिति है. तमाम मुद्दे हैं जिनकी वजह से गतिरोध बना हुआ है. हम अभी भी तय नहीं कर पा रहे हैं कि अगले कुछ दिनों में कैसे इनसे निपटा जाए."
विकासशील देशों पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा सुझाए गए तरीक़ों से जलवायु परिवर्तन के बारे में जवाबदेह बनने के लिए दबाव है. संयुक्त राष्ट्र ने इसके लिए तीन चरण सुझाए हैं यानी विकासशील देश इस बारे में ऐसे कदम उठाएं जिन्हें मापा जा सके, जिनकी सूचना दी जा सके और जिनकी जांच हो सके.
जयराम रमेश का कहना था कि ये बहुत गंभीर मुद्दा है और इस पर कोई समझौता नहीं हुआ था. उन्होंने कहा कि क्योटो संधि को बढा़ने संबंधी वार्ता की प्रगति भी काफी धीमी है. इस समझौते के तहत चालीस औद्योगीकृत देश 2012 तक क़रीब सवा पांच प्रतिशत तक कार्बन कटौती करने के लिए बाध्य हैं.
ऐतिहासिक मौक़ा
वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने सभी देशों से जलवायु परिवर्तन पर समझौते की अपील की है. कोपेनहेगेन में सदस्य देशों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि उनके पास इतिहास बदलने का अवसर है.
बान की मून ने कहा, 'हमारे पास सोचने के लिए एक और साल नहीं है, प्रकृति हमारे साथ वार्ता नहीं करेगी." इससे पहले संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने चेतावनी दी थी कि वार्ता की प्रगति काफी धीमी है और अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है.
बान की मून ने कहा, 'मैं तीन साल से दुनिया के नेताओं को बातचीत के लिए तैयार कर रहा हूं और अब सिर्फ तीन दिन बचे हैं." उन्होंने कोपेनहेगेन में मौजूद वार्ताकारों से अपील की कि मौक़े को गंवाएं नहीं.












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