'मैनेजमेंट गुरु' बनने के लिए राम से सीखें कला (फोटा सहित)
नई दिल्ली, 15 दिसम्बर (आईएएनएस)। महाकवि तुलसीदास ने 'रामचरित मानस' और आदिकवि वाल्मीकि ने 'रामायण' की रचना कर भगवान श्रीराम के चरित्र से हमारा परिचय कराया। उन्होंने भक्ति के विभिन्न आयामों के सहारे श्रीराम के चरित्र की व्याख्या की। राम ने अपने संपूर्ण जीवन का प्रबंधन अति कुशलता से किया था, जिस कारण हम उन्हें 'मैनेजमेंट गुरु' के रूप में भी देख सकते हैं।
भगवान श्रीराम के जीवन से हम प्रबंधन के मंत्र सीख सकते हैं क्योंकि आज के युग में जीवन में सबसे उपयोगी कला प्रबंधन को ही माना जाता है। डायमण्ड बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'मैनेजमेंट गुरु भगवान श्रीराम' इन्हीं बातों से हमें परिचित कराता है।
कवि और लेखक डॉ.सुनील जोगी ने 'मैनेजमेंट गुरु भगवान श्रीराम' के जरिए राम के ऐसे अनेक गुणों को प्रस्तुत करने की कोशिश की है, जिसे अपनाकर हम अपने जीवन का बखूबी प्रबंधन कर सकते हैं और सफलता भी हासिल कर सकते हैं।
पुस्तक को कुल 30 अध्यायों में बांटा गया है, जिसमें राम के सभी गुणों को शामिल किया गया है। पुस्तक में बताया गया है कि किस प्रकार राम बिना प्रचार के कार्य करने वाले व्यक्ति थे। अरण्यकांड के हवाले से बताया गया है कि राम को आत्मप्रचार कभी रास नहीं आया-
"बहुरि राम असि मन अनुमाना। होइहि भीर सबहि मोहि जाना।।
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।।"
राम ने चित्रकूट में काफी वक्त गुजारा था। जब उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वन के सभी लोग उन्हें पहचानने लगे हैं, इससे उनके उदेश्य में व्यवधान पड़ सकता है। तब वह वन से अगले पड़ाव की ओर चल पड़े थे। राम को आत्मप्रचार पसंद नहीं था। वह चुपचाप रहकर काम करना पसंद करते थे और अपने बारे में किसी को अधिक बताना भी नहीं चाहते थे। विज्ञापन के इस युग में राम के चरित्र से एक सीख लेनी चाहिए कि बिना प्रचार के शांतिपूर्वक हम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ें क्योंकि आने वाली पीढ़ी नींव को याद रखेगी न कि प्रचार को।
पुस्तक में लेखक ने दूरदर्शी राम की व्याख्या की है। लेखक का कहना है कि राम की दूरदर्शिता के गुण से हमें यह सीख मिलती है कि मनुष्य को अपने जीवन में दूरदर्शी होना चाहिए। उसे अपने भीतर वह क्षमता विकसित करनी चाहिए, जिससे वह किसी भी घटना के बारे में पूर्वानुमान लगाकर उसके लाभ और हानि का आकलन करके अपने कार्य की शुरुआत कर सके।
आज के वक्त में कूटनीति का विशेष महत्व है, वह चाहे राजनीति का क्षेत्र हो या फिर एक आम आदमी का कार्यस्थल। पुस्तक में कूटनीतिज्ञ राम पर विशेष प्रकाश डाला गया है। यह बताया गया है कि किस प्रकार राम देश, काल, वातावरण और विभिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कोई फैसला किया करते थे।
आज जब समाज में तनाव एक बीमारी की तरह फैल रही है, ऐसे वक्त में हमें कूटनीति का सहारा लेने की सीख राम देते हैं। दरअसल कूटनीति एक ऐसा अस्त्र है, जिससे बिगड़ती हुई बात का विवेकपूर्ण समाधान प्राप्त किया जा सकता है, राम ने अपने जीवन में कूटनीति को प्रबंधन से जोड़कर पेश किया था।
इस पुस्तक की खासियत यह है कि इसमें राम के विभिन्न आयामों को आज के परिप्रेक्ष्य में जोड़कर पेश किया गया है। व्यस्त रहने वाले लोग इस पुस्तक से समय का प्रबंधन और प्रेम और विनम्रता के जरिए काम करना सीख सकते हैं।
कुल 30 अध्यायों में बंटी यह पुस्तक जहां पाठकों को बांधने में सफल साबित होती दिखती है, वहीं कहीं-कहीं यह पाठकों को अपनी ओर खींचने में असफल भी होती है। मसलन कुछ जगह राम के चरित्र के सहारे कहानियों को पढ़ते वक्त पाठक ऊबने लगता है। ऐसे वक्त में पुस्तक के लेखक प्रवचन करने वाले बन जाते हैं, जहां पाठक को केवल प्रेरक प्रसंग ही हाथ लगते हैं।
वैसे तो राम कथा पर आधारित अनेक पुस्तकें हैं लेकिन राम के जीवन में प्रबंधन क्षमता को रेखांकित करने वाली यह किताब कुछ मायने में अनोखी है।
(पुस्तक समीक्षा- 'मैनेजमेंट गुरु भगवान श्रीराम', प्रकाशक- डायमण्ड बुक्स, लेखक- डॉ.सुनील जोगी)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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