कोपेनहेगन सम्मेलन में मसौदे दो, मगर विचार कई सारे : (लीड-1)
कोपेनहेगन, 11 दिसम्बर (आईएएनएस)। कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर हो रहे शिखर सम्मेलन में ग्लोबल वार्मिग से दुनिया को बचाने के लिए शुक्रवार को दो मसौदे तैयार किए गए। लेकिन ये दोनों मसौदे भी सर्वमान्य नहीं हो सके हैं और उनमें भी कई सारी खामियां मौजूद हैं।
दीर्घकालिक सहकारी कार्रवाई (एलसीए) पर अस्थायी कार्यकारी समूह के अध्यक्ष माइकल जामित कटजर और क्योटो प्रोटोकाल के अध्यक्ष जॉन एशे ने 192 देशों की सरकारों के प्रतिनिधियों को अपने मसौदे वितरित किए।
प्रतिनिधियों को इन मसौदों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए एक दिन का समय दिया गया है। डेनमार्क की पर्यावरण मंत्री कोन्नी हेडेगार्ड दुनियाभर से जुटे अपने सहयोगियों को सप्ताहांत में इस पर हुई प्रगति के बारे में जानकारी देंगी।
भारतीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश शुक्रवार को शिखर सम्मेलन में पहुंचे और पहुंचने के साथ ही उन्होंने अमेरिका, जी-77 और अफ्रीकी देशों के समूह के प्रतिनिधियों के साथ द्विपक्षीय बैठकें शुरू कर दीं।
खासतौर से भारत सरकार के प्रतिनिधियों की तात्कालिक प्रतिक्रिया यह रही कि मसौदे में कई सारे प्रश्न अनुत्तरित हैं। जैसे कि धनी देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कितनी कटौती करेंगे, या कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए वे गरीब देशों को कितना भुगतान करेंगे।
इन दस्तावेजों को ऐसे समय पेश किया गया, जब कुछ घंटे पहले ही छोटे द्वीपीय देशों के समूह ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक समझौते का एक नया प्रस्ताव पेश किया। जलवायु परिवर्तन के कारण इन देशों के समुद्र में डूबने का खतरा बना हुआ है।
एलसीए के मसौदे में चीन और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से कहा गया है कि उन्हें वर्ष 2020 तक अपने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 15 से 30 प्रतिशत की कटौती करनी चाहिए।
वार्ताकारों का मानना है कि सभी देशों को एलसीए के मसौदे के किसी न किसी हिस्से से आपत्ति है।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ग्लोबल क्लाइमेट इनीसिएटिव के नेता किम कार्सटेनसन ने कहा कि एलसीए का मसौदा सही राजनीतिक निर्णय लेने का आधार मुहैया कराता है। बेशक इसमें कई सारी खामियां हैं, लेकिन इसमें इस बात स्पष्ट संकेत भी है कि कोई एक समझौता संभव है।
उन्होंने कहा, "खामियां अब दिखाई देने लगी हैं और उन्हें राजनीतिक इच्छाशक्ति के जरिए तथा ठोस वित्तीय प्रतिबद्धताओं के जरिए दूर किए जाने की जरूरत है। हमें अभी इसके बारे में जानकारी नहीं है कि कितना पैसा आएगा और कहां से आएगा।"
इसके पहले विकासशील देशों के समूह जी-77 के प्रवक्ता ने शुक्रवार को धनी देशों पर आरोप लगाया कि वह इस सम्मेलन को कम करके आंक रहे हैं।
समाचार एजेंसी डीपीए के अनुसार जी-77 के प्रवक्ता और सूडान के लुमुंबा स्टानिसलाव डी एपिंग ने धनी देशों पर आरोप लगाया कि वे सम्मेलन को 'कम करके' आंक रहे हैं। उन्होंने कहा, "यह सम्मेलन अच्छी तरह से नहीं चल रहा है।"
कोपेनहेगन में एपिंग ने विरोधस्वरूप एक बैठक में हिस्सा नहीं लिया। डेनमार्क के समाचार चैनल 'टीवी 2' ने इस संबंध में खबर प्रसारित की थी।
एपिंग पहले भी धनी देशों पर इस तरह के आरोप लगाते आए हैं। उन्होंने कहा था कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए धनी देश धन मुहैया कराने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
उधर, गुरुवार को ब्रसेल्स में 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ विकासशील देशों के लिए बजट बनाने के मुद्दे पर सहमति बनाने में कामयाब नहीं हो सका।
गरीब देश भी अमेरिका और यूरोपीय संघ की उस योजना का विरोध कर रहे हैं, जिसमें उत्सर्जन में कटौती की बात कही गई है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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