भारत में जोर पकड़ रही

साहिल मक्कर

कोलकाता, 2 दिसम्बर (आईएएनएस)। भारत में 'ग्रीन बिल्डिंग' की अवधारणा पर इमारतों का निर्माण करने का चलन जोर पकड़ रहा है।

एक ओर जहां सरकार ऐसी इमारतों के निर्माण के लिए रियायतें देकर इस अवधारणा को आगे बढ़ा रही है, वहीं अचल संपत्ति कारोबार कंपनियों ने ग्राहकों को लुभाने के लिए इस अवधारणा को अपनी रणनीति में शामिल कर लिया है।

पर्यावरण के प्रति लोगों की बढ़ती जागरुकता भी ऐसी इमारतों के प्रति बढ़ते आकर्षण की वजह है। इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल (आईजीबीसी) के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में 2008 में ऐसी प्रमाणीकृत इमारतों की संख्या महज 18 थी और 328 परियोजनाएं प्रस्तावित थीं। वर्ष 2009 में ऐसे प्रमाणीकृत भवनों की संख्या बढ़कर 52 हो गई, वहीं भावी परियोजनाओं की संख्या भी बढ़कर 436 हो गई। इस परिषद में कारपोरेट, सरकार, वास्तुकला क्षेत्र, उत्पाद निर्माण क्षेत्र एवं दूसरे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व है।

स्पेक्ट्रम सर्विस कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के तकनीकी प्रमुख श्रेष्ठ नागपाल कहते हैं, "पिछले पांच वर्षो में ऐसी इमारतों के निर्माण का सिलसिला वाकई जोर पकड़ चुका है। भवन निर्माता कंपनियों के लिए ऐसी परियोजनाएं लाभकारी साबित होती रही हैं और उन्हें ग्राहकों को लुभाने में आसानी होती है। सरकार भी ऊर्जा खपत में कटौती एवं कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही है।"

हरित इमारतों में पानी, बिजली की खपत कम होती है और ये प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने में मददगार हैं। ऐसी इमारतों में कम कचरा पैदा होता है। हैदराबाद का सीआईआई-शोहराबजी गोदरेज ग्रीन बिजनेस सेंटर, गुड़गांव स्थित आईटीसी ग्रीन सेंटर एवं विप्रो टेक्नोलॉजीज की इमारत, मुंबई स्थित हीरानंदानी बीजी बिल्डिंग एवं चेन्नई में एबीएन एमरो सेंट्रल इंटरप्राइज सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की इमारत इसी अवधारणा पर आधारित हैं। इस क्षेत्र के एक जाने माने विशेषज्ञ पी.के बनर्जी कहते हैं कि भविष्य में यह सिलसिला और जोर पकड़ेगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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