जिंदगी और मौत की जंग अब भी लड़ रहे हैं भोपाल के लोग
भोपाल, 2 दिसम्बर (आईएएनएस)। पूरी दुनिया की संवेदना को झकझोर देने वाली भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल बीत चुके हैं, पर अभी भी इस शहर में हजारों लोग जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं। आज भी 120,000 से 150,000 लोग उस त्रासदी का असर झेल रहे हैं।
ढाई दशक पहले 2-3 दिसंबर, 1984 को तब उस हादसे की रात 3,500 से अधिक लोग मौत के मुंह में चले गए थे एवं अगले तीन दिनों में 7,000 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। हादसे के 25 साल बाद भी हर रोज करीब 6,000 लोग रोजाना अस्पताल का चक्कर लगाते हैं।
आज भी इस शहर के कई लोग उस त्रासदी का अभिशाप झेल रहे हैं। आंख, जिगर, गुर्दे की बीमारी, कैंसर, उच्च रक्तचाप, नपुंसकता, मानसिक अवसाद और विक्षिप्तता जैसी बीमारियां भुक्तभोगियों की नियति बन गई है।
ऐसी महिलाओं की संख्या बड़ी है जो उस हादसे से प्रभावित होने के कारण अनियमित मासिक धर्म की शिकार हो गई हैं। स्वास्थ्य के मोर्चे पर यह संघर्ष लोगों की जिंदगी का कड़वा पक्ष है।
गैस रिसाव का स्रोत रहे यूनियन कार्बाइड संयंत्र के ठीक सामने स्थित जेपी नगर में रहने वाली हजीरा बी अपनी किस्मत को कोसते हुए कहती है, "अच्छा होता अगर उस वक्त मर गई होती। हम तो रोज ही जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं। मेरा पूरा परिवार जानलेवा बदन दर्द, सांस की बीमारी एवं आंखों की बीमारी से ग्रस्त है।"
42 वर्षीया प्यारी बाई कहती है, "गैस रिसाव के दौरान जान बचाने के लिए भागते समय मेरा गर्भपात हो गया। इसके बाद मैं कभी गर्भवती नहीं हुई। मेरा मासिक धर्म भी रुक गया है। गैस ने मुझे मां बनने के सौभाग्य से ही वंचित नहीं किया, बल्कि मुझे कई बीमारियां भी दे दीं।" गैर-सरकारी संगठनों के आकलन के मुताबिक अभी भी इस शहर में 120,000 से 150,000 लोग बीमार हैं। हजारों लोगों की दिनचर्या अस्पतालों का चक्कर लगाने तक ही सीमित होकर रह गई है। यानी भोपाल का एक बड़ा हिस्सा अभी भी रोज मर रहा है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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