गवाह की मौत का मामला उलझा

गवाह की मौत का मामला उलझा

ग़ाज़ियाबाद में अदालत से जुड़े करोड़ों रुपए के भविष्य निधि घोटाले के मुख्य अभियुक्त और संदिग्ध जजों के खिलाफ एक अहम गवाह आशुतोष अस्थाना की शनिवार को जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत का मामला और गहरा गया है.

पुलिस के अनुसार पोस्ट मॉर्टम करने वाली डाक्टरों की टीम ने मौत का कारण अनिश्चित बताया है. डाक्टरों ने विसरा सुरक्षित कर लिया है,जिसे जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजा जाएगा.

ग़ज़ियाबाद के चीफ मेडिकल अफ़सर डाक्टर एके धवन ने बताया कि विसरा जांच रिपोर्ट आने के बाद अन्य सभी बातों को मिलाकर निष्कर्ष निकाला जाएगा.

इससे पहले जिला अस्पताल में अस्थाना की जांच करने वाले एक डॉक्टर ने संभावना जताई थी कि मृत्यु का कारण जहर हो सकता है.

अस्थाना के परिवार वालों ने जिला मजिस्ट्रेट से मिलकर आशंका जताई थी की अस्थाना की ह्त्या की गई है और इसमे उन लोगों का हाथ हो सकता है,जिनके खिलाफ उन्होंने अदालत में कलमबंद बयान दिया था. अस्थाना इस मामले में अभियुक्त होने के साथ-साथ जजों के खिलाफ एक अहम गवाह भी थे.

अस्थाना के भाई शिशिर अस्थाना ने पत्रकारों को बताया है कि वह एक दिन पहले जेल में अपने भाई से मिले थे, तब वह पूर्ण स्वस्थ थे.

मौत की जाँच

यह भी मालूम हुआ है कि पिछले कई रोज से सीबीआई अधिकारी जेल में उससे पूछताछ कर रहे थे. सीबीआई को इस मामले की अंतिम जांच रिपोर्ट अगले महीने सुप्रीम कोर्ट में देनी है और उससे पहले आशुतोष अस्थाना की इस तरह मौत हो गई.

मौत हिरासत में हुई है,इसलिए मजिस्ट्रेट से जांच तो होगी ही, मगर उससे पहले जिस तरह पुलिस ने मौत का कारण लंबी बीमारी बताया उससे संदेह होता है कि शायद अस्थाना की मौत की सच्चाई आसानी से न पता चले.

न्यायिक भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील प्रशांत भूषण का कहना है कि यह एक बहुत गंभीर मामला है.

एक रिटायर्ड पुलिस अफसर का कहना है कि चूंकि इस मामले में न्यायपालिका के नीचे से लेकर ऊपर तक अनेक जज संदेह के घेरे में हैं , इसलिए अस्थाना की मौत की जांच में कोई जज शामिल न हो और कई सेवाओं के अधिकारियों का पैनल बने.

वहीं गाजियाबाद बार असोशियेशन के वरिष्ठ नेता नाहर सिंह की मांग है कि आशुतोष अस्थाना की मौत की जांच के लिए एक विशेष जांच दल गठित किया जाए. वह इस मामले में सीबीआई के तौर तरीकों से भी संतुष्ट नही हैं.

नाहर सिंह की कानूनी लड़ाई और जनमत के दबाव में ही सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सीबीआई जांच के लिए तैयार हुई थी. इससे पहले चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने पुलिस को संदिग्ध जजों से पूछताछ की अनुमति देने से मना कर दिया था, जिससे न केवल उनकी बल्कि पूरी न्यायपालिका की किरकिरी हुई थी, क्योंकि कानूनन विवेचना के दौरान अदालत हस्तक्षेप नही कर सकती.

घोटाला

हाईकोर्ट की एक विभागीय सतर्कता जांच के बाद गाजियाबाद जिला अदालत की सतर्कता अधिकारी और विशेष न्यायाधीश रमा जैन ने 15 फरवरी 2008 को कविनगर थाने में 43 अदालती कर्मचारियों और 39 बाहरी व्यक्तियों के खिलाफ जालसाजी से भविष्य निधि खाते से करोडों रुपए निकालकर गबन करने का मुकदमा दर्ज कराया था. शुरू में सात करोड़ रुपए के घपले का अनुमान था, मगर बाद में रकम 23 करोड़ पंहुची.

माना जाता है कि और भी जिलों में इस तरह के घपले हुए होंगे.

पुलिस ने इस मामले में लगभग सभी अस्सी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया था. लेकिन उस समय पुलिस के हाथ पैर फूल गए जब मुख्य अभियुक्त आशुतोष अस्थाना ने 28 अप्रैल को कोर्ट में अपने कलमबंद बयान में बताया कि वास्तव में जिला अदालत के जजों ने ही फ़र्जी तरीके से भविष्य निधि खातों से यह धन निकलवाया.

उसने इस बात के दस्तावेज़ी सबूत भी दिए कि यह पैसा कब कब किस किस रूप में नकद, सामान या खर्च के तौर पर किन-किन जजों को दिया गया. सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला अदालतों के लगभग 35 जजों के नाम इस घोटाले में उजागर हुए.

न्यायपालिका के इतिहास में इतना बड़ा और सुनियोजित भ्रष्टाचार पहली बार उजागर हुआ. साथ ही इससे सार्वजनिक धन के लेखा जोखा रखने वाले महालेखाकार कार्यालय की कमजोरी और कुव्यवस्था भी उजागर हुई.

बार संघ ने मामले की सीबीआई जांच का दबाव बनाना शुरू किया. पर राज्य सरकार ने इसकी संस्तुति नही की. हाईकोर्ट ने भी सीबीआई जांच की मांग नामंजूर करते हुए पुलिस को जाँच करने को कहा.

मगर जिला पुलिस अधीक्षक दीपक रतन ने डर के मारे जजों से पूछताछ के लिए चीफ जस्टिस से अनुमति मांगी और चीफ जस्टिस ने अपने कानूनी दायरे से बाहर जाकर पुलिस से संभावित सवालों की सूची मांगी. इसको लेकर काफी आलोचना हुई कि न्यायपालिका अपने अंदर भ्रष्टाचार के मामलों में दोहरा मानदंड अपना रही है.

अंततः गाजियाबाद बार एसोशियेशन की याचिका पर सीबीआई जांच का आदेश हुआ. सीबीआई ने कुछ संदिग्ध जजों से पूछताछ की है और दो अंतरिम रिपोर्ट दी हैं. मगर अभी तक न तो किसी संदिग्ध जज के खिलाफ कोई विभागीय कार्यवाही हुई और न ही उन्हें न्यायिक कार्यों से अलग किया गया.

गबन और भ्रष्टाचार के आपराधिक मामले में सीबीआई की अंतिम रिपोर्ट का इंतज़ार है. मगर एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि आशुतोष की मौत से मामला कमजोर हो सकता है.

कानूनी दृष्टि से आपराधिक मामला भले कमजोर हो जाए, मगर नैतिक दृष्टि से वे जज हमेशा संदेह के घेरे में रहेंगे,जिनके घपलों का भंडाफोड़ अस्थाना ने किया था.

मामले की जांच में अड़ंगा डालने वालों, उचित कार्रवाई न करने और उसे तार्किक परिणति तक जाने से रोकने वालों की भूमिका भी न्यायिक और प्रशासनिक इतिहास में याद की जाएगी.

शायद इस मामले से सबक लेकर आगे कुछ ऐसे कानूनी बंदोबस्त हों जिससे जजों का आचरण और व्यवहार संदेह से परे रखने में कामयाबी मिले.

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