नक्सलियों के गढ़ में दो रातें

नक्सलियों के गढ़ में दो रातें

विनोद वर्मा

बीबीसी संवाददाता, उड़ीसा के जंगलों से लौटकर

वे आंदोलन कर रहे हैं लेकिन उन्होंने बंदूक उठाने का फ़ैसला किया है. वे आंदोलन के रास्ते में आने वालों को रास्ते से हटाने का फ़ैसला लेने में एक क्षण भी नहीं लगाते. इसके लिए वे कुल्हाड़ी और बंदूक से लेकर विस्फोटक तक किसी भी साधन का उपयोग कर सकते हैं.

उनकी तस्वीरें देखकर ही सिहरन हो जाती है लेकिन मुझे एक पत्रकार की तरह उनसे मिलना था और उनके साथ कुछ समय गुज़ारना था. हालांकि मैं ऐसा करने वाला कोई पहला पत्रकार नहीं था लेकिन डर फिर भी पूरा था. ख़ासकर बदली हुई परिस्थितियों में.

पिछले दिनों सरकार ने पहली बार स्वीकार किया है कि नक्सलियों का प्रभाव देश के 20 राज्यों में 223 ज़िलों में फैल चुका है. इससे पहले प्रधानमंत्री कई बार कह चुके हैं कि नक्सली देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं.

सरकार ने संकेत दिए हैं कि नक्सलियों के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई की तैयारी चल रही है. इसके लिए सेना के विशेष दस्ते का प्रयोग किया जा सकता है और ज़रुरत पड़ी तो वायुसेना का भी.

जिस समय सरकार यह आंकड़े दे रही थी, उसी समय मुझे संदेश मिला कि यदि बीबीसी चाहे तो उडी़सा में एक बड़े नक्सली नेता से मिलने का अवसर मिल सकता है. इससे पहले मैं दो ऐसे अवसरों को टाल चुका था लेकिन नए आँकड़ों और परिस्थितियों की रोशनी में मैंने इस मुलाक़ात के लिए तुरंत हामी भरी. नई परिस्थितियों में उनका पक्ष जानना भी ज़रुरी सा लग रहा था.

मेरे पुराने पत्रकार साथी पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर ने मेरे साथ चलने की स्वीकृति दी. उड़िया पुरुषोत्तम की मातृभाषा है और वे अगले कई दिनों तक मेरे लिए भाषाई सेतु बनने वाले थे. जंगलों के भीतर जाने की तैयारियाँ शुरु हो गईं.

28 सितंबर को जब मैं और पुरुषोत्तम रायपुर से भुवनेश्वर की ट्रेन पर सवार हुए तो मन में तरह-तरह के सवाल थे. मन में एक तरह का डर भी समाया हुआ था क्योंकि राज्य सरकारें अब नक्सलियों के ख़िलाफ़ आक्रामक रुख़ अपनाए हुए हैं और पत्रकारों के प्रति उनका रवैया भी अब बदला हुआ है.

भुवनेश्वर में 29 सितंबर का दिन मैंने तैयारियों में गुज़ारा. छतरी, दवाइयाँ, बैटरी और कुछ बिस्कुट आदि. शाम छह बजे हम एक पैसेंजर ट्रेन में सवार होकर चल पड़े. साढ़े चार घंटे की यात्रा के बाद हमारा पहला पड़ाव आया ब्रह्मपुर. यहाँ हमें नक्सलियों के पहले संपर्क सूत्र से मिलना था.

दुर्गापूजा की गहमा-गहमी अभी जारी थी. भीड़ भरी सड़कों के किनारे हमारी मुलाक़ात एक व्यक्ति से हुई. उनसे मिली सलाह के अनुसार रात साढ़े ग्यारह बजे जो कुछ मिला वह खाकर हम एक होटल में ठहर गए. उन्होंने आगे का रास्ता हमें बता दिया था. उन्होंने हमें एक अख़बार में लपेटकर कुछ पत्रिकाएँ दीं. मैंने अनुमान लगाया कि यह हमारी पहचान के लिए कोई कूट संकेत है. सोते-सोते रात के एक बज गए. हमें सुबह तीन बजे उठना था, ताकि हम सुबह चार बजे की बस ले सकें.

सुबह जब सड़क पर निकले तो कुत्तों के भौंकने और रोने की आवाज़े आ रही थीं. न ऑटोरिक्शा का अता-पता था न रिक्शा ही नज़र आ रहा था. सूनसान सड़क पर हम अपने ही क़दमों की आहट सुनते हुए चल पड़े. फिर एक कार आती दिखाई पड़ी जिसने कई गुना ज़्यादा भाड़ा लेकर हमें बस स्टेशन छोड़ा. वह भी बहुत मिन्नतों के बाद.

फिर शुरु हुई बस की यात्रा. गंजाम और गजपति ज़िलों के जिन रास्तों से बस गुज़री वह ख़ूबसूरत पहाड़ी इलाक़ा था. लगातार हो रही बारिश की सुबह ख़ूबसूरत लग रही थी. हमारे आसपास की सीटों पर लोग बदलते रहे और लेकिन उनके चेहरे पर ग़रीबी के निशान एक जैसे ही थे. एक भी चेहरा ऐसा नहीं था जिस पर रक्तल्पता यानी एनीमिया के लक्षण न हों.

छह घंटों की यात्रा के बाद हम कंधमाल और गंजाम ज़िले की सीमा के एक गाँव में उतरे. हालांकि यह वह जगह नहीं थी, जहाँ हमें पहुँचना था. वहाँ दो घंटे अगली बस का इंतज़ार करने के बाद हमने सामान ढोने वाली एक जीप से आगे बढ़ने का फ़ैसला किया. कहने को वहाँ सड़क थी लेकिन रास्ते में गड्ढों, पत्थरों और कीचड़ के अलावा कुछ नहीं था. पंद्रह किलोमीटर का रास्ता हमने एक घंटे से अधिक समय में तय किया.

यहाँ रास्ते में सड़क के किनारे चर्च दिखाई देने लगे थे. ड़्राइवर ने बताया कि यह ईसाई-हिंदू दंगों का इलाक़ा रहा है. एक पिछड़े से गाँव में पहुँचने के बाद हमें उस व्यक्ति की तलाश करनी थी जो हमें आगे बढ़ने में मदद करने वाला था.

पुरुषोत्तम ने बताया कि इलाक़े में कम दबाव का क्षेत्र बना हुआ है. घनघोर बारिश ने इसकी पुष्टि की. लेकिन मन में जो उमड़-घुमड़ रहा था, उसका दबाव मौसम से अधिक था.

(शेष अगले अंक में)

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