मां नहीं बन पाई फिर भी कहलाती हैं माई

लखनऊ, 6 अक्टूबर (आईएएनएस)। 20 साल पहले इस महिला के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूटा था। जब उसे मालूम हुआ कि वह गर्भाशय के कैंसर से पीड़ित है और भविष्य में कभी मां नहीं बन पाएगी, लेकिन इस सबके बावजूद आज वह 80 बच्चों की मां है।

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की रहने वाली बीना राणा गरीब विकलांग और बेसहारा बच्चों के लिए एक अनाथ आश्रम चलाती हैं। आश्रम के सभी बच्चे बीना को माई कहकर पुकारते हैं।

46 वर्षीय बीना राणा ने आईएएनएस से कहा, "भले ही मैंने इन बच्चों को जन्म नहीं दिया, लेकिन ये मेरे लिए मेरे अपने बच्चों की तरह हैं। मैं इन बच्चों की हमेशा ऋणी रहूंगी। आखिरकार इन्होंने मुझे फिर से जीवन जीने का एक मकसद दिया है। जब मुझे पता चला था कि अपनी जिंदगी में मैं अब कभी मां नहीं बन पाऊंगी तो मैं जीवन से हार गई थी। वह बहुत दर्दनाक अनुभव था।"

चिकित्सकों द्वारा गर्भाशय के कैंसर के बारे में पता चलने पर बीना गंभीर अवसाद में चली गई थी। अधिकांश समय वह खुद को कमरे में बंद करके रखती थी। इस दुख की घड़ी में बीना के पति वीरेंद्र कुमार ने हर कदम पर उनका साथ निभाया।

बीना कहती हैं, "परेशानियों से ध्यान हटाने के लिए मेरे पति ने अनाथ आश्रम खोलने का सुझाव दिया। उन्होंने मुझे अहसास दिलाया कि बिना मां बने भी मैं बच्चों के साथ रहकर उन्हें प्यार देकर अपनी जिंदगी हंसी-खुशी से जी सकती हूं। इसी अहसास से इस आश्रम की नींव पड़ी। मेरे पति ने मुझे बेसहारा बच्चों की देखभाल के लिए प्रेरित किया। आज इन बच्चों के बीच मुझे बीती बातें सोचने तक का मौका नहीं मिलता।"

अपने पति के साथ बीना ने 14 साल पहले अखिल भारतीय विकलांग अनाथ आश्रम खोला। शुरुआत में 3 बच्चे थे। आज यहां 80 बच्चे हैं। आश्रम में बीना की बहनें और व अन्य करीबी रिश्तेदार सहयोग करते हैं।

बीते सालों में तमाम ऐसे बच्चे यहां से निकले, जो आश्रम में दिए गए व्यावसायिक प्रशिक्षण की बदौलत आज स्वावलंबी बन गए हैं और अपना जीवन खुशहाली में जी रहे हैं।

खेती करने वाले बीना के पति वीरेंद्र कुमार कहते हैं, "मुझे इस बात से गर्व महसूस होता है कि मैं इस आश्रम से जुड़ा हूं। यद्यपि यह मेरा विचार था, लेकिन मेरी पत्नी की कड़ी मेहनत के बगैर यह संगठन सफल नहीं हो सकता था। हमारा मकसद केवल बेसहारा गरीब बच्चों को आश्रय प्रदान करना ही नहीं, बल्कि उन्हें इस काबिल बनाना है कि वे अपने पैरों पर खड़े होकर समाज की मुख्य धारा में शामिल हो सकें।

अनाथ आश्रम गरीब बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बुनियादी शिक्षा मुहैया कराता है और फिर उन्हें उनकी रुचि के आधार पर सिलाई, कढ़ाई व अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण दिया जाता है।

बिना किसी सरकारी मदद के बीना बीते 14 सालों से आश्रम चला रही हैं। इस काम में स्थानीय लोग राणा की मदद करते हैं। वह कहती हैं कि हर महीने स्थानीय लोग स्वेच्छा से चंदा देकर हमारी मदद करते हैं। हम उनके बहुत आभारी हैं। बिना लोगों की मदद के इतने सारे बच्चों की देखभाल करना संभव नहीं है।

आश्रम के बच्चों में उम्र में सबसे बड़ा 18 साल का ज्ञानू बताता है, "मेरे पिता की मृत्यु के बाद मेरे चाचा ने मुझसे एक ढाबे में जबरन काम कराया। वे मुझे खाने के लिए पर्याप्त खाना नहीं देते थे, जब मैं खाना मांगता तो वह मुझे पीटते थे। माईं कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मुझे वहां से मुक्त कराकर मुझे अपने घर ले आईं।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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