नेत्रदान के संकल्पों के बाद भी नहीं किए जाते नेत्रदान

देश में दृष्टिहीनों की संख्या 20 लाख के आसपास है। प्रत्येक वर्ष इस आंकड़े में 30,000 की अतिरिक्त वृद्धि हो जाती है।

आंख में रोशनी कार्निया के रास्ते ही जाती है। कार्निया के धुंधला होने से दृष्टि कमजोर या बिल्कुल खत्म हो सकती है। इस स्थिति को कार्नियल ब्लाइंडनेस कहते हैं। ऐसे में कार्निया प्रत्यारोपण के जरिए आंखों में रोशनी वापस लौटाई जा सकती है।

इस रोग से पीड़ित आधे लोगों की आखों में ऑपरेशन के जरिए रोशनी लौटाई जा सकती है।

लेकिन प्रति वर्ष 100,000 कार्निया की मांग के मुकाबले मात्र 16,000 कार्निया ही उपलब्ध हैं।

एक प्रमुख नेत्र विशेषज्ञ एस.सी.गुप्ता ने आईएएनएस को बताया, "हमारे देश में पर्याप्त संख्या में लोग अपनी आंखें दान करने का संकल्प लेते हैं, लेकिन यह कहने में मुझे दुख होता है कि नेत्रदान की संख्या उस हिसाब से पर्याप्त नहीं है।"

कार्निया प्राप्त करने का एक मात्र रास्ता नेत्रदान ही है।

दक्षिणी दिल्ली में वेणु नेत्र संस्थान व अनुसंधान केंद्र के निदेशक गुप्ता कहते हैं, "नेत्रदान का संकल्प तो तमाम लोग लेते हैं, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद परिवार के लोग दुख के क्षण में नेत्रदान की औपचारिकता नहीं निभा पाते। वे शव से आंखों को निकालने की डॉक्टरों को अनुमति ही नहीं देते। ऐसे समय में समझाने वाले विशेषज्ञों की जरूरत होती है।"

ऐसे में मृतक के परिवार को भी धैर्य से काम लेने की जरूरत होती है। क्योंकि उनके धैर्य के कारण किसी की आंखों में रोशनी लौटाई जा सकती है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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