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लिट्टे के ऊपर जीत के बाद...

By Staff
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लिट्टे के ऊपर जीत के बाद...

पर क्या इस जीत के साथ ही तमिल समस्या और श्रीलंका में पैदा हुए गृह युद्ध अपने आप ख़त्म हो जाएगा या असली समस्या लिट्टे पर नियंत्रण के बाद शुरू होगी.

क्या श्रीलंका की महेंद्र राजपक्षे सरकार की सैन्य कार्रवाई के अलावा आगे की भी कोई रणनीति है. श्रीलंका मामलों के जानकार और लिट्टे नेता वेल्लुपिल्लई प्रभाकरण की जीवनी लेखक, पत्रकार एम आर नारायणस्वामी कहते हैं, "मेरे ख़्याल से एलटीटीई का ख़ात्मा कभी नहीं होगा. लेकिन मैं कहूँगा कि पिछले 20-25 वर्षों में एलटीटीई को इतना ज़बरदस्त धक्का कभी नहीं लगा है."

साथ ही वे कहते हैं कि सरकार की सोच सैन्य विजय से आगे नहीं है. उनके पास तमिलों के अंदर विश्वास पैदा करने, उन्हें साथ लेकर चलने की कोई नीति नहीं है.

मेरे ख़्याल से एलटीटीई का ख़ात्मा कभी नहीं होगा. लेकिन मैं कहूँगा कि पिछले 20-25 वर्षों में एलटीटीई को इतना ज़बरदस्त धक्का कभी नहीं लगा है एमआर नारायणस्वामी, वरिष्ठ पत्रकार

मेरे ख़्याल से एलटीटीई का ख़ात्मा कभी नहीं होगा. लेकिन मैं कहूँगा कि पिछले 20-25 वर्षों में एलटीटीई को इतना ज़बरदस्त धक्का कभी नहीं लगा है

पर क्या तमिल छापामार समस्या है या तमिल निवासियों के समान अधिकारों की मांग?

सेंटर फ़ॉर लैंड वार फ़ेयर स्टडीज़ में वरिष्ठ विशेषज्ञ, एन मनोहरण कहते हैं, ''लिट्टे इस समस्या की जड़ नहीं है पर इस समस्या ने लिट्टे को जन्म दिया है, जब तक सरकार तमिल समस्या के निदान के बारे में गंभीर कदम नही उठाती. जब तक सभी को साथ लेकर चलने वाला एक राजनीतिक हल नही ढूँढा जाता ये समस्या लिट्टे के जाने के बाद भी बनी रहेगी और हिंसा की घटनाएँ भी जारी रहेंगी.''

मानवीय त्रासदी

खबरों के मुताबिक युद्ध क्षेत्र में दो-ढ़ाई लाख आम नागिरक फँसे हैं

पर फिलहाल युद्ध जारी है और इससे जुड़ी मानवीय त्रासदी भी.

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया शोधकर्ता मीनाक्षी गांगुली कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय क़ानून में कहा जाता है कि युद्ध के दौरान आम नागरिकों की सुरक्षा हर तरह से होनी चाहिए लेकिन सेना और एलटीटीई के बीच युद्ध में दोनों तरफ़ से इसका पालन नहीं किया जा रहा है."

मसला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि युद्ध क्षेत्र में न कोई पत्रकार है न ही श्रीलंका सरकार किसी स्वतंत्र संगठन या संयुक्त राष्ट्र को वहाँ जाने दे रही है.

कितने लोग युद्ध क्षेत्र में फंसे है. क्या उन्हें लिट्टे अपने साथ ले जा रहा है, या क्या सेना उन्हे विस्थापित होने पर मजबूर कर रही है... ये सभी सवाल उठ रहे हैं.

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि ढाई लाख लोग, जिनमें ज्यादातर तमिल हैं, कठिनाइयों का सामना कर रहे है. उनके सामने खाने की, सिर छुपाने के लिए छत की कमी है तो लिट्टे का उन पर लड़ने का दबाव और मजबूरी भी है. कम उम्र के लोगो को लिट्टे लड़ाई में झोंक रहा है.

अंतरराष्ट्रीय क़ानून में कहा जाता है कि युद्ध के दौरान आम नागरिकों की सुरक्षा हर तरह से होनी चाहिए लेकिन सेना और एलटीटीई के बीच युद्ध में दोनों तरफ़ से इसका पालन नहीं किया जा रहा है मीनाक्षी गांगुली, मानवाधिकार कार्यकर्ता

अंतरराष्ट्रीय क़ानून में कहा जाता है कि युद्ध के दौरान आम नागरिकों की सुरक्षा हर तरह से होनी चाहिए लेकिन सेना और एलटीटीई के बीच युद्ध में दोनों तरफ़ से इसका पालन नहीं किया जा रहा है

श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे हालाँकि कह रहे है कि उनकी पूरी कोशिश नागरिकों को बचाने की है.

पर सच्चाई इस से शायद थोडी़ अलग है. मीनाक्षी गांगुली कहती हैं, "हमें जो ख़बरें मिल रही हैं उनके मुताबिक दो-ढाई लाख लोग युद्ध क्षेत्र में फंसे हुए हैं."

वहीं केहेलिया राम्बुक्वेल्ला कहते हैं, ''इस देश का हर नागरिक इससे चिंतित है क्योंकि वो लोग हमारे भाई बहन हैं. हमारी चिंता उन लोगों से ज़्यादा है जो विदेशो में बैठ कर सहानुभूति के बोल बोल रहे है, कह रहे है कि यहाँ शरणार्थी है, उनकी देखभाल की ज़रूरत है."

श्रीलंका में अंतरराष्ट्रीय शांति सैनिक भेज कर हाथ जला चुका भारत, हर क़दम फूँक-फूँक कर ही रखना चाहता है.

वे कहते हैं, "हमें इस बात पर ध्यान देना है कि लिट्टे के आतंक से छुट्टी जल्दी मिले और इससे हम सभी बहुत खुश होंगे. देश में जो सद्भाव का माहौल खंडित हुआ है उसे वापस हमे का़यम करना है और इस क्षेत्र के पुनर्निर्माण का काम भी करना है.''

पर श्रीलंका सरकार के सैन्य रणनीति पर ज़ोर देने और आगे मूल समस्या के बारे में कुछ न करने से विश्व समुदाय की चिंता बढ़ी है.

सरकार ने सर्वदलीय प्रतिनिधि समिति बनाई थी जिसने केवल तमिल समस्या के निदान के लिए एक अंतरिम रिपोर्ट सौपी जिसे भी कई राजनितिक दलों ने अस्वीकार कर दिया.

अब देश के उत्तर और पूर्व के तमिल बहुल इलाकों को अधिक अधिकार देने के लिए संविधान में तेरहवें संशोधन की दुहाई दी जा रही है पर विशेषज्ञ कहते हैं कि वो भी तमिल आबादी को संतुष्ट नही कर पाएगा. समस्या जस की तस बनी रहेगी क्योंकि सरकार की सोच में कोई बदलाव नही आया है.

भारत की भूमिका

दूसरी ओर तमिल हित की बात करने वाला कोई एक मज़बूत राजनीतिक दल भी नहीं है, जो कह सके कि वो श्रीलंका के तमिलों का प्रतिनिधित्व करता है.

सरकार ने तमिल समस्या के निदान के लिए एक अंतरिम रिपोर्ट सौपी जिसे कई राजनितिक दलों ने अस्वीकार कर दिया

इन सारी बदलती स्थिति में भारत की क्या भूमिका है और क्या होनी चाहिए.

विदेश सचिव शिव शंकर मेनन श्रीलंका में इसी संदेश को लेकर गए है कि लिट्टे को परास्त करने के बाद क्या किया जाएगा. साथ ही युद्ध से ध्वस्त किलिनोची के पुनर्निर्माण में भारत मदद करना चाहेगा.

पर भारत की भूमिका दोनों पक्षों, श्रीलंका सरकार और तमिलों के बीच बातचीत करवाने की भी हो सकती है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एकजुट करने की भी हो सकती है.

''इस देश का हर नागरिक इससे चिंतित है क्योंकि वो लोग हमारे भाई बहन है. हमारी चिंता उन लोगों से ज़्यादा है जो विदेशो में बैठ कर सहानुभूति के बोल बोल रहे है, कह रहे है की यहाँ शरणार्थी है, उनकी देखभाल की ज़रूरत है केहेलिया रामबुक्वेल्ला, श्रीलंकाई सेना के प्रवक्ता

''इस देश का हर नागरिक इससे चिंतित है क्योंकि वो लोग हमारे भाई बहन है. हमारी चिंता उन लोगों से ज़्यादा है जो विदेशो में बैठ कर सहानुभूति के बोल बोल रहे है, कह रहे है की यहाँ शरणार्थी है, उनकी देखभाल की ज़रूरत है

हालांकि श्रीलंका में अंतरराष्ट्रीय शांति सैनिक भेज कर हाथ जला चुका भारत, हर क़दम फूँक-फूँक कर ही रखना चाहता है. एन मनोहरण कहते हैं, ''खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि मैं भारत की नीति से सबसे नाखुश हूँ पर मैं भारत की मुश्किल भी समझता हूं. भारत लिट्टे के साथ बात नहीं कर सकता. फिर तमिलनाडु की राजनीति भी है. दूसरी ओर उसे चीन और ईरान और पाकिस्तान के श्रीलंका में बढ़ते दखल की भी चिंता है. इन सभी ने भारत की श्रीलंका नीति को पेचीदा बना दिया है.''

भारत सभी को मान्य, राजनितिक हल की बात कहता भी रहा है और समय समय पर अंदरूनी राजनीति, विशेषकर तमिलनाडु की राजनीति के मद्देनज़र श्रीलंका सरकार पर तमिल समस्या के बातचीत से हल की बात भी कहता रहा है.

पर अब तमिल राजनीति में भी कई बदलाव आए है.

एमआर नारायणस्वामी कहते हैं, "तमिलनाडु में अब तमिल समस्या को लेकर राजनीतिक दल उतना संवेदनशील नहीं हैं जितना कि 80 के दशक में थे. पहले तमिलनाडु में दोनों राजनीतिक दल लिट्टे को समर्थन देने के लिए कूद पड़ते थे लेकिन वर्तमान में दोनों ही लिट्टे को समर्थन देने की बात से इनकार करते दिखते हैं और एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते हैं."

श्रीलंका सरकार पच्चीस साल के गृह युद्ध के विध्वंस से उबरने में भारत की मदद चाहेगी और भारत देश की राजनीति और सुरक्षा के मद्देनज़र तमिलों को न्याय और अधिकार दिलाने की आशा पर अपनी श्रीलंका नीति आगे बढाएगा.

पर विश्लेषक कहते है कि ऐसी आशा रखना कि मौजूदा सरकार लिट्टे पर नियंत्रण के इतना करीब पहुँचने की खुशी में बड़ा दिल रख तमिल मांगों पर उदारता से विचार करेगी, फ़िलहाल ऐसे कोई आसार नज़र नहीं आ रहे.

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