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केबल नियमों में बदलाव सभी पक्षों से बातचीत के बाद : मनमोहन (लीड-1)

By Staff
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    देश के अग्रणी प्रसारकों की प्रधानमंत्री से बातचीत के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, "केबल टेलीविजन नेटवर्क (नियमन) अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव पर विभिन्न मीडिया संगठनों के प्रतिनिधियों से प्रधानमंत्री की बात हुई। प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि सभी प्रतिभागियों से बातचीत और आम सहमति के बाद ही इस कवायद को अंतिम रूप दिया जाएगा।"

    इससे पहले विभिन्न समाचार चैनलों के संपादकों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा, "सरकार द्वारा प्रस्तावित कवायद का उद्देश्य आतंकवादी गतिविधियों, सेक्स, अपराध और नार्को फुटेज के प्रसारण के नाम पर मीडिया पर नकेल कसना है।"

    इससे पहले वैचारिक मतभेदों को भुलाकर भाजपा ने जहां प्रसारकों का समर्थन और केंद्र सरकार की इस कवायद का विरोध किया है वहीं माकपा ने भी यही रवैया अपनाया।

    माकपा महासचिव प्रकाश करात ने बुधवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर इस मामले में सर्वसम्मति बनाने की अपील की और कहा कि सरकार जल्दबाजी में कोई कदम न उठाए।

    केबल टेलीविजन नेटवर्क (नियमन) अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव पर करात ने कहा, "हमारी पार्टी का मानना है कि मीडिया पर लगाम कसने के लिए जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए।"

    करात ने पत्र में कहा है, "टेलीविजन चैनलों के स्वनियामक तंत्र के बावजूद एक स्वतंत्र मीडिया नियामक का गठन आवश्यक है लेकिन चर्चा और आम सहमति के बाद ही इसका गठन होना चाहिए।"

    उन्होंने कहा, "जब तक ऐसा नहीं हो जाता तब तक सरकार की ओर से मीडिया के लिए किसी प्रकार के दिशा निर्देश जारी नहीं होना चाहिए।"

    भाजपा के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, "मीडिया पर लगाम कसने का अर्थ यह नहीं है कि सरकार उस पर दिशा-निर्देश थोपे।"

    उन्होंने कहा कि मीडिया को ईमानदारी से स्वनियामक तंत्र का अनुसरण करना चाहिए और ऐसी परिस्थिति से बचना चाहिए जिसमें कि राष्ट्र विरोधी तत्व मीडिया की आजादी का फायदा उठाए।

    इससे पहले, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा, "इस बारे में कोई भी फैसला राजनीतिक दलों के बीच आमसहमति बनाकर ही लिया जाना चाहिए।"

    राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के कार्यकारी संयोजक शरद यादव ने भी कहा, "सरकार इस बारे में कोई भी एकतरफा फैसला नहीं ले सकती। संसद का सत्र होने वाला है। इस पर बहस होनी चाहिए और उसके आधार पर सर्वसम्मति से कोई फैसला लिया जाना चाहिए।"

    उल्लेखनीय है कि खबरिया चैनलों पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार कानून लाने की कवायद में जुटी हुई है।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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