एचआईवी व रक्त कैंसर के रोगियों के लिए उम्मीद की नई किरण
ज्ञात हो कि श्वेत रुधिर कणिकाएं शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
डॉक्टरी की भाषा में सीडी4+टी लिंफोसाइट्स के नाम से प्रचलित ये श्वेत रुधिर कणिकाएं, रक्त कैंसर (ल्यूकेमिया) से पीड़ित रोगियों के लिए जरूरी अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण व कीमोथेरैपी के दौरान व्यापक रूप से नष्ट हो जाती हैं।
श्वेत रुधिर कणिकाओं के नष्ट होने के कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। परिणामस्वरूप रोगियों में तरह-तरह के संक्रमण के खतरे बढ़ जाते हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता को फिर से वापस लौटने में वर्षो लग सकते हैं। युनिवर्सिटी ऑफ मांट्रियल के माइसोन्युवे-रोजमोंट अस्पताल के मार्टिन गुइमोंड ने उस कार्यविधि की पहचान कर ली है, जो श्वेत रुधिर कणिकाओं के पुनर्जन्म को रोकती हैं।
इस खोज से एचआईवी ग्रस्त या रक्त कैंसर के इलाज के दौरान रोग प्रतिरोधक क्षमता गंवा बैठे रोगियों को नई उम्मीद बंधी है।
युनिवर्सिटी की ओर से जारी एक ज्ञापन में कहा गया है कि गुईमोंड के अध्ययन ने उस नकारात्मक क्रियाविधि की पहचान कर ली है, जो श्वेत रुधिर कणिकाओं की द्विगुणन क्षमता को नष्ट कर देती है।
बयान में गुइमोंड ने कहा है, "इस नकारात्मक क्रियाविधि पर कार्रवाई कर हम सीडी4+टी लिंफोसाइट्स यानी श्वेत रुधिर कणिकाओं के उत्पादन को बढ़ावा दे सकते हैं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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