आंतकवादियों को अपने हाथों से नहीं भूनने का मलाल है अरुण जाधव को
मुंबई, 30 दिसंबर(आईएएनएस)। उनकी एक बांह में अभी भी गोली धंसी हुई थी और आतंकवादियों की ओर से गोलियों की बौछार में हेमंत करकरे, अशोक काम्टे और विजय सालस्कर जैसे पुलिस अधिकारी अप्रत्याशित रूप से शहीद हो गए। ये ऐसी यादें हैं जो उनके जेहन में आग की तरह अब भी सुलगती रहती हैं।
जांबाज पुलिसकर्मी नायक अरुण जाधव को ताउम्र उसका मलाल रहेगा कि वे अपने हाथों से आतंकवादियों को मार गिरा नहीं पाए। वैसे, उनके द्वारा दी गई त्वरित सूचना आतंकवादियों के खिलाफ मुहिम के लिए जरूर बेहद उपयोगी साबित हुई। जाधव उस गाड़ी में सवार थे जिस पर आतंकवादियों ने गोलियां बरसाकर करकरे, काम्टे और सालस्कर की जान ले ली थी।
एंटी-एक्सटॉर्शन विंग से जुड़े जाधव को इस हमले में पांच गोलियां लगीं। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद घर लौटे जाधव ने आईएएनएस से बातचीत करते हुए कहा, "मुझे मलाल है कि घायल हो जाने के कारण मैं हथियार नहीं उठा पाया। उस दिन मेरे पास पिस्तौल भी नहीं थी। मैंने यह एक अधिकारी को दे रखी थी। अगर पिस्तौल होती तो दाहिने हाथ से आतंकवादियों को मार गिराता।"
वे उपरोक्त विंग में सालस्कर के सहयोगी थे। अपने बॉस को याद कर वह भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं, "सालस्कर साहब की हिम्मत की जितनी तारीफ करें, कम है। उनके जैसा निडर अधिकारी मैंने आज तक नहीं देखा। मैं उनकी विरासत को जिंदा रखने के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार हूं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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