बांग्लादेश के 'बिहारी' उपेक्षा का शिकार

यहाँ उन लोगों को बिहारी कहा जाता है जो वर्ष 1971 में बांग्लादेश के जन्म के समय पश्चिमी पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) नहीं जा पाए थे.
इस वर्ष मई में अदालत के आदेश के बाद उन्हें वोटर लिस्ट में शामिल किया गया. हालाँकि इनकी संख्या की कोई औपचारिक गिनती नहीं हुई है पर माना जाता है की लगभग 70 हज़ार बिहारी यहाँ रहते हैं.
बिहारियों की इतनी बड़ी आबादी राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा वोट बैंक है. अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेताओं ने उनके विकास के वायदे करने शुरू कर दिए हैं.
उम्मीद की किरण
आवामी लीग के कुछ समर्थकों ने उर्दू में लिखे बैनर बाँटने शुरू किए हैं क्योंकि ये लोग उर्दू ही पढ़ पाते हैं. अब शायद नागरिक का दर्जा पाए ये बिहारी बेहतर जीवन भी जी पाएंगे.
इन चुनावों में भी जैसा की बांग्लादेश की राजनीति में लम्बे समय से होता रहा है, दो महिलाओं का बोलबाला है.
एक ओर आवामी लीग की नेता शेख़ हसीना तो दूसरी तरफ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की ख़ालिदा ज़िया हैं.
लेकिन इस बार 300 सीटों वाली संसद में कुल 50 महिलाएं ही खड़ी हो सकी हैं. जबकि वर्ष 2001 के चुनावों में 48 महिलाएं चुनाव लड़ी थीं.
बांग्लादेश में भी भारत की तरह वो महिलाएं उम्मीदवार हैं जिनके पति भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों में लिप्त होने की वजह से चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं.
आवामी लीग ने 16 तो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने 14 महिलाओं को टिकट दिए हैं जबकि सात आज़ाद उम्मीदवार मैदान में हैं.
इन चुनावो में न केवल बांग्लादेश की राजनीति की दो बेगमों के भाग्य का फ़ैसला होगा बल्कि 50 महिला उम्मीदवार भी इन चुनावों में अपनी क़िस्मत आज़मा रही हैं. लेकिन यहाँ की महिलाएं मज़ाक में कहती हैं की क्या राजनीति में दो बेगम ही काफ़ी नहीं?
71 का मुद्दा
इस बार चुनाव में एक मुद्दा ज़ोरों से उठ रहा है वो है 1971 के मुक्ति आंदोलन में उन लोगों की भूमिका की जिन्होनें पाकिस्तान का साथ दिया.
यहाँ के सामाजिक कार्यकर्ता और ग़ैर सरकारी संस्थान इल्ज़ाम लगा रहे हैं कि जमाते इस्लामी जैसे संगठनों से जुडे क़रीब 20 से ज़्यादा ऐसे उम्मीदवार हैं जिन पर बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में अपराध और अत्याचार के आरोप लगे थे.
ग़ैर सरकारी संगठनों की मांग है की इन लोगों पर कार्रवाई हो ताकि पुराने ज़ख्म भरे जा सकें.












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