बीजिंग ओलंपिक : अभिनव बिंद्रा, विलक्षण बालक से ओलंपिक चैंपियन तक का सफर
बीजिंग, 11 अगस्त (आईएएनएस)। ओलंपिक मुकाबलों की व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीत कर इतिहास रचने वाले भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा की सफलता कोई चमत्कार नहीं है जो रातों-रात घटित हुआ हो। इसके पीछे बरसों की कड़ी मेहनत और तपस्या का योगदान है।
चंडीगढ़ के एक संपन्न परिवार में जन्में अभिनव को अपने घर में ही निजी शूटिंग रेंज की सुविधा मिली। बिंद्रा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सफलताएं अर्जित करने के बावजूद जमीन से अपना जुड़ाव बरकरार रखा।
उनके पिता ए.एस. बिंद्रा कहते हैं कि अभिनव एक 'साइलेंट किलर' है जो बिना शोरगुल किए खामोशी से अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहता है।
एक दौर में चोटों से जूझ रहे अभिनव के सामने ऐसी परिस्थिति बन गई थी जब लगा कि उनका करियर अब समाप्त ही हो जाएगा। उन्हें दोहा एशियाड से अपना नाम वापस लेना पड़ा था लेकिन अभिनव ने हार नहीं मानी और 2006 में क्रोएशिया के जगरेब में आयोजित विश्व चैंपियनशिप में खिताबी जीत हासिल कर उन्होंने बीजिंग ओलंपिक के लिए पात्रता अर्जित की।
उसके बाद जो हुआ वह तो अब इतिहास का हिस्सा है। अभिनव ने सोमवार को जब दस मीटर राइफल स्पर्धा का स्वर्ण जीता तो यह 28 साल बाद दूसरा मौका था जब देश को ओलंपिक में स्वर्ण पदक मिला। इससे पहले सन 1980 के हाकी मुकाबलों में भारत ने स्वर्ण जीता था। खेलों के इतिहास में किसी भारतीय द्वारा जीता गया यह पहला व्यक्तिगत स्वर्ण था।
अभिनव ने मात्र 16 वर्ष की अवस्था में सन 2000 के सिडनी ओलंपिक में भाग लेकर भारत की ओर से सबसे कम उम्र के ओलंपियन बनने का गौरव हासिल किया था।
सन 2001 में उन्हें देश के सर्वोच्च खेल सम्मान 'राजीव गांधी खेल रत्न' से सम्मानित किया गया। सन 2002 के मैनचेस्टर राष्ट्रमंडल खेलों में अभिनव ने जोड़ी स्पर्धा में स्वर्ण और व्यक्तिगत स्पर्धा में रजत पदक जीता था। 2004 के एथेंस ओलंपिक में विश्व कीर्तिमान ध्वस्त करने के बावजूद मामूली अंतर से पदक जीतने से चूक गए थे।
बीजिंग में अंतिम दौर में अभिनव पहले स्थान के लिए मुकाबले में फिनलैंड के निशानेबाज हेनरी हैक्के नेन के साथ बराबरी पर थे लेकिन उन्होंने अपने अंतिम प्रयास में जिसमें 10.8 का शानदार स्कोर किया था वह हेक्के नेन के 9.7 के स्कोर से काफी बेहतर था। चीन के झु क्वि नान ने 10.5 के स्कोर के साथ रजत हासिल किया जबकि फिनलैंड के खिलाड़ी को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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